गुरु पूर्णिमा पर विशेषसंस्कृति अंक-दिनांक – २९-०७-२०२६आलेख -बृजमोहन जोशी नैनीताल।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है। शिव पुराण के अनुसार – अट्ठाइसवें द्वापर में इसी दिन भगवान विष्णु के अंशावतार वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। ‘ब्रह्मसूत्र ‘और चारों वेदों की रचना करने के फलस्वरूप ही ये ” वेद व्यास” नाम से विख्यात हुए। उन्होंने महाभारत सहित १८ पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों की रचना की जिनमें श्रीमद्भागवत,श्रीमद् देवी भागवत महापुराण जैसे अतुलनीय ग्रन्थ भी हैं।
इनका वास्तविक नाम महर्षि कृष्ण द्वैपायन था। कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इन्हें वेदों के संकलनकर्त्ता और महाभारत, अट्ठारह पुराणों के रचयिता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें भगवान विष्णु के अंशावतार और हिन्दू धर्म के अनुसार सात अमर चिरंजीवीयों में से एक माना जाता है। महाभारत ग्रंथ का लेखन भगवान गणेश जी ने महर्षि व्यास जी से सुन सुन कर किया था।
इस दिन जगत गुरु वेद व्यास सहित अन्य गुरुओं की भी पूजा की जाती है।अज्ञानता से मुक्त करने के लिए परमेश्वर ने अपने ह्रदय से योगियों के सूक्ष्म तत्व श्री रुद्र को प्रकट किया जिन्होंने ब्रह्मा के अंतर्मन को विशुद्ध करने के लिए – ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करने का ज्ञान देकर ब्रह्मा का मोह रुपी अंधकार दूर किया।अतः अपने शिष्य को ‘ तमसो मा ज्योतिर्गमय ‘यानी अंधकार की बजाय प्रकाश की ओर ले जाना ही गुरुता है। प्रत्येक युग में गुरु की सत्ता परमब्रह्म की तरह कण कण में व्याप्त रही है। गुरु विहिन संसार अज्ञानता की काल रात्रि मात्र ही है।संत तुलसीदास जी ने कहा है कि – गुरु की कृपा प्राप्ति के बगैर हम इस जीवन संसार सागर से मुक्त नहीं हो सकते चाहे वह ब्रह्मा विष्णु महेश के समान ही क्यों न हों। शास्त्रों में ‘ गु’ का अर्थ अंधकार या मूल अज्ञान और ‘ रु’ का अर्थ उसका निरोधक ( प्रकाश) बताया गया है।अंधकार से हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाला गुरु ही है।
सभी गुरुजनों को प्रणाम।
गुरु पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।










