उत्तराखंड के लोग नन्दादेवी को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते है। यहां की लोककथाओं में नन्दादेवी को हिमालय की पुत्री कहा जाता


श्री नन्दा देवी महोत्सव धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति के संरक्षण का संदेश देता है। श्री नन्दा को पार्वती का रूप माना जाता है जो नंदा देवी पर्वत में रहती है । संस्कृत के शब्द नंदा अर्थात आनंद या खुशी देने वाली इसलिए आनंद प्रदान करने वाली देवी । श्री नन्दा की मूर्तियों का निर्माण प्राकृतिक अवयव कदली के तने ,हरे बाँस ,कपास के साथ कॉटन के कपड़े में प्राकृतिक रंगों से लोक पारंपरिक कलाकारों द्वारा किया जाता है तथा भृंगराज का आसान एवं डहेलिया के पुष्प की माला माता को प्रिय है । महोत्सव में चावल डालने की परम्पराभी है । महोत्सव में पौधारोपण भी किया जाता है जो हिमालय को संरक्षित रखने का संदेश देता है । महोत्सव का प्रसाद गेहूं तथा प्राकृतिक अनाज से बनता है जो प्रकृति के साथ हमारे जुड़ाव को मजबूत करता है । मा को ब्रह्मकमल चढ़ाने की परंपरा भी है । महोत्सव प्लास्टिक से दूर रहने का संदेश देता है । नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व जो यूनेस्को की लिस्ट में शामिल है अपनी समृद्ध जैव विविधता एवं वन्य जीवो के लिए जाना जाता है ।तथा हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण को संतुलित करता है तथा नदी के साथ भूमि के उर्वरकता पीने का जल प्रदान करते है ।प्रकृति के संतुलन का संदेश भी हमें मिलता है ।किंतु ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन से पर्यावरण असंतुलन हो रहा है । हमें हिमालय के वनों को बचाना होगा । नंदा देवी के प्रति यह अगाध श्रद्धा असल में पहाड़ों के प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों, बुगियालों (घास के मैदान) और जैव विविधता के प्रति प्रेम व संरक्षण का बोध कराती है।