नेता की बुराई का भी अनुकरण
अब जैसे कि बताया गया है कि नेतृत्व करने वाले कार्यकर्ता अन्य कार्यकर्ताओं के लिए आदर्श बन जाते हैं, तो स्वाभाविक ही है कि ऐसे आदर्श रूप कार्यकर्ताओं के गुणों का अनुकरण करने की प्रेरणा जैसे छोटे कार्यकर्ताओं को मिलती है, वैसे ही उनकी बुराई के अनुकरण की भी मानसिकता कार्यकर्ताओं में पैदा होती है । अंग्रेजी में एक सूत्र आता है- Love begets love ! वैसे ही हम कह सकते हैं- Ego begets ego ! यानी यदि नेतृत्व करने वाले कार्यकर्ता में अहंकार का भाव पैदा होता है तो अनुकरण के माध्यम से अन्य कार्यकर्ताओं के मन में भी वह भाव संक्रमित होता है । अब नेता भूल जाता है कि यदि जमीन पर लात मारेंगे तो जमीन भी आप को उतनी ही चोट पहुँचाएगी। आप के अहंकार के प्रज्वलन के साथ-साथ अपने सभी साथियों का अहंकार भी प्रज्वलित होता है यद्यपि पहले वे अहंकारी नहीं होते हैं। उसका कारण, वे पहले जानते हैं कि हमारे प्रमुख कार्यकर्ता के मन में अहंकार नहीं है। वह ध्येयनिष्ठ है। ध्येय के प्रति आत्मसमर्पित है। लेकिन साथियों को जब यह अनुभव होता है कि ऐसे ज्येष्ठ कार्यकर्ता के मन में भी अहंकार है तो उसके परिणामस्वरूप आहिस्ता आहिस्ता उनके भी मन के स्खलन का भी प्रारंभ होता है।
अहंकार के कारण स्वयं को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख कार्यकर्ता सोचता है कि बाकी लोग तो इसी प्रकार आत्मसमर्पित रहने ही वाले हैं। इनमें से मैं अपना करिअर या स्थान क्यों न बना लूँ? और फिर उसके द्वारा चतुराई के प्रयोग होने लगते हैं। Service before self की जगह Self without service की मानसिकता बनना शुरू होती है। इतना ही नहीं तो अगर कुछ त्याग वगैरह करना ही पडेगा तो फल का हिसाब मन में रखकर आवश्यक उतना ही न्यूनतम ऐसा त्याग करेंगे यह भी मानसिकता निर्माण होती है। परंतु ऐसा प्रमुख कार्यकर्ता यह नहीं सोचता कि ‘अरे, हम चतुर होंगे तो जो आत्मसमर्पित हैं, उनके अन्दर भी यह चतुराई आ जाएगी। वे आत्मसमर्पित नहीं रहेंगे। वे यह सोचेंगे कि अपना प्रमुख कार्यकर्ता ही यदि स्वयं को बढ़ावा देने के लिए ऐसे चतुराई का आसरा लेता है, तो क्यों नहीं हम भी अपना करिअर बनाएँ?’ तो अगर नेता और अनुयायियों में ही ऐसी होड लगी तो करिअर की दृष्टि से, लौकिकी दृष्टि से कार्यकर्ता बड़े, ऊँचे हो जाते हैं लेकिन संगठन तो बौना ही रह जाता है।
और चतुराई के कारण कार्यकर्ताका ऐसा जल्दी ऊँचा चढ़ना पतंग जैसा रहता है, जब कि संगठन की दृष्टि से हमारी अपेक्षा रहती है कि वह वृक्ष केसमान ऊँचा हो । याने संगठन के धरातल का उसका संबंध तो टूट न जाए बल्कि और भी विकसित होने के लिए धरातल से ही उसे जीवनरस प्राप्त हो।
कार्यकर्ता : मा○ दत्तोपन्त ठेंगडी : पृष्ठ 253












