व्यक्ति पूजा नहीं, तत्व पूजा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज को अपना गुरु माना है। भगवा ध्वज त्याग व समर्पण का प्रतीक है। स्वयं जलते हुए सारे विश्व को प्रकाश देने वाले सूर्य के रंग का प्रतीक है। सम्पूर्ण जीवों के शाश्वत सुख के लिए समर्पण करने वाले साधु, सन्त भगवा वस्त्र ही पहनते हैं। भगवा त्याग का प्रतीक है। अपने राष्ट्र जीवन तथा मानव जीवन के अनेक इतिहासों का साक्षी है यह ध्वज । यह शाश्वत है, अनन्त है, चिरन्तन है ।
संघ तत्व पूजा करता है, व्यक्ति पूजा नहीं क्योंकि व्यक्ति शाश्वत नहीं है। हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवनधारा में यज्ञ का बड़ा महत्व रहा है। यज्ञ शब्द के अनेक अर्थ हैं। व्यक्तिगत जीवन को समर्पित करते हुए समष्टि जीवन को परिपुष्ट करने के प्रयास को यज्ञ कहा गया है। सद्गुण रूप अग्नि में अयोग्य, अनिष्ट, अहितकर बातों को होम करना यज्ञ है। श्रद्धामय, त्यागमय, सेवामय, तपस्यामय जीवन व्यतीत करना भी यज्ञ है। यज्ञ का अधिष्ठाता देव यज्ञ है। अग्नि की प्रतीक है ज्वाला, और ज्वालाओं का प्रतिरूप है-
अपना परम पवित्र भगवाध्वज ।
शिवोभूत्वा शिवंयजेत् शिव की पूजा करना यानि स्वयं शिव बनना, अर्थात शिव के गुणों को आत्मसात् करना, जीवन में उतारना है। भगवाध्वज की पूजा यानि त्याग, समर्पण जैसे गुणों को अपने जीवन में उतारते हुए समाज की सेवा करना है। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने स्वयं अपने जीवन को समाज की सेवा में अर्पित किया था, ध्येय के अनुरूप अपने जीवन को ढाला था। समर्पण भाव से ही सारे समाज में एकात्म भाव बढ़ता है। इस भावना से ही लाखों स्वयंसेवक अपने समाज के विकास के लिए हजारों सेवा प्रकल्प चलाते हैं।












