गुरुदक्षिणा समर्पण भाव का प्रतीक

“दक्षिणा का विचार केवल पैसे की दृष्टि से नहीं करना चाहिए। प्रत्यक्ष पूजन का आग्रह करना चाहिए। दक्षिणा चंदे जैसी इकट्ठी नहीं करनी चाहिए। अधिक से अधिक स्वयंसवेकों को प्रत्यक्ष ध्वजपूजन कर दक्षिणा समर्पित करनी चाहिए। यह मेरा कार्य है, इसके लिए मुझे उठाने चाहिए, कुछ देना चाहिए. यह स्वयंसेवकों की वृत्ति रहे। यह भाव निरंतर बढ़े, ऐसा प्रयास होना चाहिए। पसा जुटाना, धन संचय करना न हमारा कार्य है और न ही हमारा हेतु हमारे कार्य का वह एक स्वाभाविक परिणाम रहे।

यह भी पढ़ें 👉  मंगोली में सेवा संकल्प अभियान के तहत ‘विकसित भारत’ कार्यक्रम आयोजित

तन-मन-धन पूर्वक में अपना काम करूँगा- यह विचार हमारे कार्य का आधार है। पहले ही दिन कोई भी व्यक्ति सर्वस्व तो समर्पित नहीं कर सकता। उस भावना का क्रम से विकास करना पड़ता है। गुरुदक्षिणा बढ़ाने के लिए अयोग्य आग्रह अथवा जोर-जबरदस्ती कभी नहीं करनी चाहिए। स्वयंसेवक की सद्भावना को आघात नहीं पहुँचाना चाहिए। किसी का मन नहीं दुखाना चाहिए। स्वयंसेवकों के मन की प्रसन्नता भंग नहीं होनी चाहिए।’

श्री गुरुजी समग्र : खंड ३ पृष्ठ : 136

Advertisement
ADVERTISEMENTS
यह भी पढ़ें 👉  कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कैडेट गौरव सिंह बिष्ट का यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम–2026 के लिए चयन
Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad