बौल -श्रम गीत(हुड़किबौल)संस्कृति अंकआलेख -बृजमोहन जोशी नैनीताल।दिनांक -०८-०७-२०२६


नैनीताल । बौल शब्द कृषि गीतों के लिए प्रचलित है।आषाढ़ माह में किसान परिवार गुड़ाई और रोपाई के काम में व्यस्त रहते हैं। फिर भी जिनके खेत अधिक हैं और काम करने वाले कम है उनके खेत की गुड़ाई उनके खेत की रोपाई छूट जाती है।उसे पूरा करने के लिए आषाढ़- श्रावण माह में मडुवे की गुड़ाई व धान की रोपाई में बौल लगाये जाते हैं।
गुडौल- मंडुवे की गुड़ाई में अनेक महिलाएं गुड़ाई करती हैं। गुडौल गीत गाने वाले लोक गायक को ” बौलिया या गुडौलिया” कहा जाता है। एक विशेष बात यह है कि गुड़ाई का कार्य करने वाली महिलाएं खेत में पिछे की ओर से आगे को ओर को गुड़ाई करती है जबकि धान की रोपाई करने वाली महिलाएं आगे से पीछे की ओर रोपाई करती हैं।
हुड़कीबौल को श्रम गीत व कृषि गीत की श्रेणी में रखा गया है।
बौल श्रम गीत है,जो श्रम गीतों के माध्यम से कृषि का कार्य करते समय संगीत का आनन्द दिलाती है जो गुडौल और हुड़कीबौल में देखी जा सकती है। संगीत की मधुर स्वर ध्वनियां मानव में उर्जा का संचार करती हैं।और कृषि का कार्य करते समय यदि गायन के साथ साथ वादन भी हो तो इसका अलग ही आनंद है। यहां गती के अर्थ में बौल शब्द आया है।
बौल शब्द बेगार के लिए प्रयुक्त होता है।हुड़कीबौल का तात्पर्य है हुड़ुकिये द्वारा दी गयी बेगार।इस सामूहिक कृषि उत्सव को गुडौल – हुड़कीबौल नाम न देकर ” बेगार” लेने की एक शोषण प्रक्रिया है।ग्रामीण सामंतों की मनोवृत्ति है कि उन्होंने गायन वादन में श्रम कर रही महिलाओं व हुड़किये से गायन वादन के रूप में इस प्रकार श्रम ” बेगार” लिया जिसका उनको पता भी नहीं चला अर्थात श्रम के बदले श्रम।तब द्रव्य (मजदूरी) शायद नकद धनराशि के रूप में देने का प्रचलन नहीं था। हुड़किये और गुडौलिये को तब फसल पैदा होने पर ” खौव” इच्छानुसार अनाज दिया जाता था अर्थात फ़सल में इन लोक गायकों का भी हिस्सा होता था।
हुड़कियाबौल श्रम गीत भी है और पवाड़े गायन की एक शैली भी। बौल गीत में लोक गायक हुड़किया जो गायन के साथ साथ लोक वाद्य यंत्र हुड़के का वादन भी करता है तथा इस कार्य का अगवान भी होता है। कृषि का यह समस्त कार्य उसी के निर्देशन में होता है।
वह गुड़ाई और रोपाई कार्य के आरम्भ में सर्वप्रथम देव स्तुति इस प्रकार करता है –
भूमिया,धरती माता की वन्दना करता है राजा बिरमा,दुलि पधानी की वीर गाथाओं का गायन करता हैं। जैसे –
दिये विद s दिये दिन हो भूमिया देवा,
तू छै भूमि को भूदार हो भूमिया देवा,
खेती जीमी को जिमदार हो भूमिया देवा,
विद दिया स्योव दिया भूमिया देवा……!
गुडौल- गीत
द होs कोसिया को नौव लपकी हौली,
द्वि ब्या म्यारा घर छना तीसरी नौली,
द हो s कै खण्ड पुराणी रैंछ कै खण्ड नौली….
भावार्थ – कोसिया के नौले में कोहरा लगा हुआ है,दो पत्नियां मेरी घर पर हैं तीसरी नवेली है। किस खण्ड में पुरानी,किस खण्ड में नवेली रहती है….! गुड़ाई और रोपाई के सम्पन्न होने पर लोक गायक द्वारा आशीष अवश्य दी जाती है
जैसे –
जी रया बची रया तुम सब लोग
गौ को सयाण जी रौ,
कुणी को पुरूखा
गोठ को बल्द जी रौ
गोदी को बाला
यौ सेरी का मोत्यूं
सब भोग भोगी जाया
हल्द बल्द सब कण
बरो बरी दिया
जी रया जागी रया
सब रोपाई तोपाई हो
रोपारों – तोपारो कन
बरो बरी दिया हो…!