नैनीताल।संस्कृति अंक।आलेख व छायांकन बृजमोहन जोशी, नैनीताल। दिनांक -२०-०८-२०२६
नैनीताल के रूसी गांव में “बिरूड़ पंचमी – आंठू-” अर्थात गंवरा मैंसर अनुष्ठान की धूम”
हिमालय शिव का प्रिय स्थान है। उत्तराखंड देवी देवताओं और ऋषियों मुनियों की तपोभूमि रही है। यहां लोक देवी नन्दा में दैवी शक्तियों का समावेश होने से राजकुमारी नन्दा और आद्य शक्ति नन्दा व गंवरा को भक्त समाज एक ही भाव से देखता है। एक ओर लौकिक रूप से दैवी भाव आरोपित होता है तो दूसरी ओर शिव की अर्धांगिनी गंवरा पर भी लौकिक रूप से दैवी भाव आरोपित होता है। तब आद्य शक्ति गंवरा भी (गौरा) बनकर अनेक अभावों एवं कष्टों से जुझने वाली एक साधारण पर्वतीय नारी बन जाती है।
भादो माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी से ही इस अनुष्ठान की तैयारी हो जाती है। जिसे यहां के पंचांगों में बिरूड़ पंचमी नाम दिया गया है। बिरूड़ पंचमी को पंच अनाजों की पूजा की जाती है। इन पंच अनाजों को यहां बिरूड़ कहा जाता है। इसी कारण इसे बिरुड़ पंचमी कहा जाता है।
नैनीताल के समीप रूसी गांव में पिछले ७० वर्षों से स्थानीय महिलाओं के सहयोग से श्रीमती देवकी देवी पत्नी स्वर्गीय श्री लछम सिंह बिष्ट के आवास पर आरम्भ हुआ यह गंवरा मैंसर अनुष्ठान अब उनके सुपुत्र श्री नंदन सिंह बिष्ट तथा बहू श्रीमती गीता बिष्ट अपनी सास श्रीमती देवकी देवी के साथ करती आ रहीं थीं किन्तु इस वर्ष पारिवारिक कारण से यह आयोजन इसी गांव में श्रीमती निधी बिष्ट श्री तरुण बिष्ट जी के आवास पर स्थानीय महिलाओं के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
लोक शिल्प विधा के अन्तर्गत गवंरा मैंसर तथा बाला गणपति की मूर्तियों (पूतलों) का निर्माण श्रीमती चम्पा खनी, चन्द्रा खनी, वन्दना,
निधी व दीपा बिष्ट द्वारा किया गया।
आचार्य श्री विनोद जोशी जी द्वारा विधिवत पूजन अर्चन आदि कर इस अनुष्ठान का शुभारंभ किया गया।
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह लोक पर्व इस अंचल में अलग अलग तिथियों को मनाऐ जाते हैं। बिरूड़ पंचमी के दिन स्त्रियां नहा धोकर इस पंच अनाज को जिसमें चना,
मटर, गेहूं,कलों, गहत,भट
आदि अनाज होते हैं। इन्हें तांबे के बर्तन में भिगोने डालती हैं। बर्तन के बाहर चारों ओर पांच जगहों पर गोबर लगातार दूब घास के तिनके भी रोपे जाते हैं। व्रत की कथा को महिलाएं लोक गीत के रूप में गाती हैं। कुंवारी ब्याहता महिलाएं जो अभी मां नहीं बनीं हैं उनके द्वारा “सावा”(स्थानीय पौधों) या अनाज के पौधों की सहायता से कुमाऊनी लोक शिल्प “डिकर” विधा के अन्तर्गत इन मूर्तियों का निर्माण किया जाता है जिनमें गंवरा,मैंसर तथा बाला की मूर्तियां (पुतले) बनाये जाते हैं उन्हें लोक परिधान और आभूषण पहनाये जाते हैं तथा इन्हें एक डलिया में स्थापित कर गंवरा,मैंसर व बाला को घर के भीतर स्थापित किया जाता है।
जब बहू गंवरा से सन्तान की कामना करती है तो लोक गीत में कहती हैं…..गौरा देवी को सप्तमी को व्रत करूं सासू…. तो सास कहती हैं – …सात समुन्द्र पार बटिक ल्याओ रे चेलियो कुकुड़ी माकुड़ी को फूल… बहू कहती हैं -… गहरी छू गंगा चिफलो छ बाटो कसिकें ल्यूलों इजू कुकुड़ी माकुड़ी को फूल।
गौरा मैंसर की डलिया को सर मैं रखकर गीत गाती हुई महिलाओं ने पूर्व निर्दिष्ट घर में प्रवेश किया। और महिलाएं आवाज लगाती हैं कि ओ ईजा- ओ ईजा ” ललि मायके आ गई है “और लोक गीतों के बोलों से गंवरा का स्वागत किया जाता है।
… बिरूड़ पंचमी से आरम्भ लोक संस्कृति में गंवरा
मैंसर अनुष्ठान के इस आयोजन में स्थानीय महिलाओं के द्वारा बिरूड़ भाट की कथा का गायन सामुहिक रूप से किया गया। स्थानीय महिलाओं के द्वारा बड़े ही भक्ति पूर्वक बारी बारी से नृत्य गीत के माध्यम से बाला गणपति को इस नृत्य लोक गीत के साथ झुलाया गया – गीत के बोल इस प्रकार से हैं-
… हुलेरी बाला हुलेरी….
इसके बाद ननद और भाभी के खेलों का आयोजन किया गया। इसके उपरांत फल फटकने का खेल खेला गया,
फल फटकने में जिसके आंचल में फल आता है उसे शुभ शकुन माना जाता है। इसके बाद महिलाओं के द्वारा घर के आंगन में गंवरा के जन्म से लेकर ससुराल जाने तक के लोक नृत्य गीतों (झोड़ा) का नृत्य गायन किया गया। गीतों को बोल इस प्रकार थे-
….तू देवी भल करिये…..
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..हिट गंवरा बागेश्वरा….
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…ओ दीदी गंवरा हो तुम के झुमो…. मेरी बैणा गंवरा हो तुम के झुमो…..
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…फूला हाजरी का फूला त्वै देवी फूल चढुलों…..
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…नाची बौ खेली बौ लौली गंवरा देवी धौ तेरो कस नाचा…… आदि लोक नृत्य गीतों का गायन किया गया।यह व्रत मुख्य रूप से संतान की प्राप्ति व अटल सुहाग की कामना के उद्देश्य से किया जाता है।
लोक साहित्य की इस लोक गाथा में गंवरा भगवान शिव की अर्धांगिनी न होकर एक सामान्य पर्वतीय नारी है जो एक अभावग्रस्त कन्या है,
एक आदर्श पत्नी है, एक परम्परागत स्त्री है जो एक पर्वतीय ग्रामीण नारी की भांति अनेक अभावों को झेलती है, अपनी सास द्वारा प्रताड़ित होती हैं, ननदों के द्वारा सताती जाती है,जिसे अपने मायके पक्ष पर
अभियान है,उसे अपने मां- बाप ,भाई- बहन ,मामा- मामी,कका- काकी,दादा- दादी,नाना -नानी का भरोसा है। और वह अपनी सास का ताना सुनकर दिया जलाने के लिए तांबें की कुनड़ी,कपास
की बाती,तेल लेने के लिए अकेले ही अपने मायके को निकल पड़ती है,अपने दुध मुहे बच्चे को छोड़कर।
गंवरा जो प्रसन्न होने पर आशीर्वाद देती है और क्रोध आने पर श्राप भी देती है।
इस अनुष्ठान में श्रीमती निधी बिष्ट, प्रेमा बिष्ट, राधा बिष्ट, चम्पा खनी, चन्द्रा खनी, रेखा खनी, गंगा बिष्ट, धना बिष्ट,
दीपा बिष्ट, प्रेमा बिष्ट, विमला मेहरा, कांता मेहरा, दीपिका गैलाकोटी, पूनम गैलाकोटी,
निकीता गैलाकोटी, विद्या गैलाकोटी, दीपा गैलाकोटी, गंगा गैलाकोटी, दीपा जोशी,
लता जोशी, दिव्या बिष्ट, मेघा चौहान द्वारा सहभागिता की गयी।
… आज भी समाज में ऐसा देखा जाता है दिन प्रतिदिन महिलाओं के साथ हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, कुमाऊनी लोक गाथाओं में स्त्री गृह जीवन में त्याग, ममता और कर्तव्य का एक महान उदाहरण है। स्त्री वेदना और पीड़ा, दुख और विशाद- विलास, विराग के मध्य वह एक समान रहती है। स्त्री सहिष्णुता और धीरता की मूर्त है , वह कन्या, बहू,पत्नी, मां, बहन आदि अनेक रूपों में सामाजिक कुरीतियों अत्याचारों परम्पराओं आदि का शिकार रही हैं!
इस अनुष्ठान को सफल बनाने में श्री नन्दन सिंह बिष्ट,गोविन्द सिंह,गोपाल सिंह बिष्ट आदि द्वारा विशेष सहयोग दिया गया।










