संस्कृति अंक”ज्ञान कलश”हमारे प्राचीन वैज्ञानिकदिनांक -२०- ०७- २०२६ नैनीताल ।बृजमोहन जोशी।(महानुभाव उपरोक्त विषय से संबंधित संक्षिप्त जानकारी आपके साथ सांझा कर रहा हूं)!पुरातन ग्रंथों के अनुसार –


…..हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि एवं दार्शनिक हमारे आदि वैज्ञानिक थे,जिन्होंने अनेक आविष्कार किये और अध्यात्म के साथ-साथ विज्ञान को भी ऊंचाइयों पर पहुंचाया।पौराणिक ग्रंथों में इन वैज्ञानिक ऋषियों का वर्णन इस प्रकार मिलता है जैसे – अश्विनी कुमार –
मान्यता है कि ये देवताओं के चिकित्सक थे।कहा जाता है कि इन्होंने उड़ने वाले रथ एवं नौकाओं का आविष्कार किया था।
धन्वंतरि-
इन्हें आयुर्वेद का प्रथम आचार्य व प्रवर्तक माना जाता है। इनके ग्रन्थ का नाम धन्वंतरि संहिता है।
शल्य चिकित्सा शास्त्र के आदि प्रवर्तक सुश्रुत और नागार्जुन इन्हीं की परम्परा में हुए थे।
महर्षि कपिल –
सांख्य दर्शन के,प्रवर्तक व सूत्रों के रचयिता थे महर्षि कपिल,जिन्होंने चेतना की शक्ति एवं त्रिगुणात्मक प्रकृति के विषय में महत्वपूर्ण सूत्र दिए थे।
कणाद ‌ऋषि-
ये वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक है। ये अणु विज्ञान के प्रणेता रहे हैं। इनके समय अणु विज्ञान दर्शन का विषय था,जो बाद में भौतिक विज्ञान में आया।
सुक्षुत-
ये शल्य चिकित्सा पद्धति के प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य थे। इन्होंने सुक्षुत संहिता नामक ग्रंथ में शल्य क्रिया का वर्णन किया है। सुक्षुत ने ही त्वचा रोपण (प्लास्टिक सर्जरी) और मोतियाबिंद की शल्य क्रिया का विकास किया था।पार्क डेविस ने सुक्षुत को विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक कहा है।
जीवक-
सम्राट बिंमबसार के एक मात्र वैद्य।उज्जयिनी सम्राट चंड प्रद्योत की शल्य चिकित्सा इन्होंने ही की थी।
अग्नि वेश-
ये शरीर विज्ञान के रचयिता थे।
शालिहोत्र –
इन्होंने पशु चिकित्सा पर आयुर्वेद ग्रंथ की रचना की।व्याडि-‌ये रसायनशास्त्री थे
इन्होंने भैषज (औषधि)
रसायन का प्रणयन किया।
अलबरूनी के अनुसार-व्याडि
ने एक ऐसा लेप बनाया था
जिसे शरीर पर मल-कर
वायु में उड़ा जा सकता था।
आर्य भट्ट –
इन्होंने अंकगणित, रेखा गणित,बीज गणित आदि विषयों में युगांतरकारी कार्य किए। इनसे ही विश्व को वर्ग, वर्ग क्षेत्र,घन,घन‌ फल,वर्गमूल,
घन मूल, क्षेत्रफल आदि के फार्मूले जानने को मिले।
वराहमिहिर-
मान्यता है कि वराहमिहिर ने ब्रह्माण्ड की रचना,उसके रूप,प्रतिष्ठा,आकर्षण शक्ति,
पृथ्वी का अक्ष भ्रमण,आदि का ज्ञान सैकड़ों वर्ष पूर्व दे दिया था।वराहमिहिर ने मुख्यतः पंच सिद्धान्तिका, बृहत्संहिता,बृहज्जातक
और लघु जातक नामक ग्रन्थों की रचना की।
साभार – देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

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