पटवाडांगर में स्थापित हुआ “पटवा गार्डन”, विलुप्तप्राय हिमालयी प्रजाति संरक्षण की अनूठी पहल

नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने कुलपति प्रो. (कर्नल) दीवान सिंह रावत के गतिशील नेतृत्व एवं प्रोत्साहन में आंतरिक शोध अनुदान से संचालित एक महत्वपूर्ण अनुसंधान परियोजना को सफलतापूर्वक पूर्ण किया है। यह परियोजना हिमालयी क्षेत्र की अत्यंत दुर्लभ एवं औषधीय महत्व वाली वनस्पति मीजोट्रोपिस पेलिटा (पटवा/परवा) के संरक्षण एवं माइक्रोप्रोपेगेशन पर केंद्रित थी। यह प्रजाति मुख्यतः उत्तराखण्ड के पटवाडांगर क्षेत्र में पाई जाती है तथा प्राकृतिक आवास के क्षरण एवं कम प्राकृतिक पुनर्जनन के कारण तेजी से विलुप्ति की ओर बढ़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में मेईज़ोट्रोपिस पेलिटा को “क्रिटिकली एन्डेंजर्ड (CR)” अर्थात अति संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में कुमाऊँ विश्वविद्यालय का यह प्रयास हिमालयी जैव विविधता संरक्षण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
परियोजना के अंतर्गत प्रो. तपन नैलवाल के नेतृत्व में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इन-विट्रो तकनीक के माध्यम से स्वस्थ पौध तैयार करने तथा बड़े पैमाने पर संवर्धन की सफल तकनीक विकसित की। शोध से यह भी स्पष्ट हुआ कि इस पौधे में महत्वपूर्ण रोगाणुरोधी गुण मौजूद हैं, जो भविष्य में औषधीय एवं फार्मास्यूटिकल अनुसंधान के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
कुमाऊँ विश्वविद्यालय द्वारा इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण पहल करते हुए पटवाडांगर क्षेत्र में “पटवा गार्डन” की स्थापना भी की गई है, ताकि इस दुर्लभ प्रजाति का प्राकृतिक संरक्षण, संवर्धन एवं जन-जागरूकता सुनिश्चित की जा सके।
इस अवसर पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड की हिमालयी जैव विविधता केवल पर्यावरणीय धरोहर ही नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान एवं भविष्य की जैविक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय स्थानीय एवं विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण हेतु अनुसंधान आधारित पहल को निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है। कुलपति ने शोधकर्ताओं की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के अनुसंधान समाज, पर्यावरण एवं विज्ञान तीनों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं तथा भविष्य में औषधीय एवं जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई संभावनाएँ विकसित करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय अपनी स्वर्ण जयंती वर्ष से अग्रसर होते हुए हिमालयी पारिस्थितिकी, जैव विविधता संरक्षण एवं स्थानीय संसाधनों पर आधारित शोध को नई दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध है









