प्रथम मंत्र वेद का प्रवेश द्वार है-अतुल सहगल

नैनीताल l केंद्रीय आर्य युवक परिषद के तत्त्वावधान में सामवेद के प्रथम मंत्र की व्याख्या प्रस्तुत की गईयह करोना काल से 570 वाँ वेबीबार था। वैदिक प्रवक्ता अतुल सहगल द्वारा ‘सामवेद ( अग्नेयं पर्व ) का प्रथम मन्त्र की विस्तृत व्याख्या की गई ‘l उन्होंने भूमिका के रूप में हर वेद के प्रथम मन्त्र की बात रखी और यह कहा कि प्रथम मन्त्र उस वेद कि खिड़की या द्वार के समान होता है जो उस वेद का प्रस्तुतिकरण करते हुए उसका दिग्दर्शन कराता है,उसकी झलकियां दिखाता है।सामवेद उपासना का वेद है और इसका प्रथम मंत्र भी उपासना के साधन और सहायक की बात कहता है।साधन मनुष्य के अन्तःकरण के अंश — मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हैं और सत्यज्ञान है, साधक मनुष्य है और सहायक परमेश्वर है।उन्होंने मन्त्र में आने वाले विभिन्न शब्दों का शाब्दिक अर्थ प्रस्तुत करते हुए उनका संयुक्त पदार्थ रखा।इस वेद मन्त्र के केंद्रीय भाव पर प्रकाश डाला और कहा कि यह मन्त्र भक्ति भाव में रहकर ईश्वर से निकटता स्थापित करने पर केंद्रित है और भक्ति भावनाओं से भरा है।फिर मन्त्र को बारह अंशों में विभक्त करते हुए,एक एक अंश की विस्तार से व्याख्या की और मन्त्र के सार और मार्मिक अर्थ के परिपेक्ष में इन अंशों के भाव प्रकट किये।साथ ही अपने उद्बोधन के पूर्वभाग में यह तथ्य सामने रखा कि सामवेद में साम शब्द के अर्थ — अंतकर्म और ईश्वर समान बड़े महत्वपूर्ण हैं।वक्तव्य के उत्तरार्द्ध में कहा कि ईश्वर सच्चिदानंद होने के कारण मनुष्य के लिए अध्यात्मिक तृप्ति एवं आनंद का स्रोत है उस का प्रदाता है।मनुष्य तो अल्प बुद्धि और अल्प शक्तियों और अल्प ज्ञान वाला है।सत्यज्ञान से मनुष्य अपने और ईश्वर के कर्म और स्वभाव समझे और ऐसा करके ही वह ईश्वर और स्वयं की दूरी मिटा सकता है।उपासना इसी की प्रक्रिया है।उपासना में ईश्वर अपने साधक के अन्तःकरण के विकार दूर करते हुए उसको पवित्र करता है।ईश्वर के कुछ गुणों का मनुष्य की आत्मा में समावेश होता है। यह अध्यात्मिक यज्ञ है।परमात्मा हर यज्ञ का केंद्र बिंदु है और उपासना यज्ञ में लीन मनुष्य को यह तथ्य भली भांति समझना चाहिए।यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न करने वाला ईश्वर ही है।इसलिए अपने जीवन को सफल बनाने के लिए ईश्वर के साथ सामिप्य बनाये रखना महत्वपूर्ण है।जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति स्वयं के पुरुषार्थ और ईश्वर कृपा पर निर्भर है और इस पुरुषार्थ में ईश्वर स्तुति,प्रार्थना और उपासना भी आ जाते हैं।इनमें भी उपासना अंतकर्म होने के कारण विशेष महत्त्व रखता है।सामवेद उपासना का वेद होने के कारण हमें यह बताता है कि ईश्वर से मानव जीवात्मा जितना प्रेम करती है, उससे दस गुना अधिक प्रेम ईश्वर जीवात्मा से करता है।भक्त या साधक की आत्मा और परमात्मा के मिलन से आध्यात्मिक यज्ञ संपन्न होता है,जिसका लाभ साधक समेत ईश्वर की प्रजा को होता है।
मुख्य अतिथि आर्य नेत्री ऊषा सूद व अध्यक्ष विद्योतमा झा ने भी अपने विचार रखे।केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया। राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
गायिका प्रवीणा ठक्कर, रविन्द्र गुप्ता, ईश्वर देवी, कमला हंस, कुसुम भण्डारी, आदर्श सहगल, कौशल्या अरोड़ा आदि के मधुर भजन हुए।









