वट सावित्रीसंस्कृति अंकआलेख बृजमोहन जोशी नैनीतालदिनांक १६ मई २०२६दिन – शनिवार.

ज्येष्ठ मास के व्रतों में ‘वट सावित्री ‘ व्रत आज मनाया जा रहा है। वट देव वृक्ष है।वट के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, तथा अग्र भाग में शिव स्थित रहते हैं। शीर्ष में देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं।
वट मूले स्थितो ब्रह्मा वट मध्ये जनार्दन:।
वटाग्रे तु शिवो देवः सावित्री वटसंश्रिता।।(पद्मपुराण)
इसी अक्षय वट वृक्ष के पत्र पुटक पर प्रलय के अन्तिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण ने मार्कण्डेय ऋषि को बाल रूप में प्रथम दर्शन दिए।
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बाल मुकुन्दं मनसा स्मरामि।(पद्मपुराण)
प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणीमाधव के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है भक्त शिरोमणि तुलसी दास ने संगम स्थित इस अक्षय वट को तीर्थराज का छत्र कहा है।
संगमु सिंहासन सुठि सोहा।
छत्र अखय वटु मुनि मनु मोहा।।
(रा.च.मा.१/१०५/७)
इसी वट वृक्ष के नीचे सावित्री ने अपने पति व्रत से मृत पति को पुनः जीवित किया था। तब से यह व्रत वट सावित्री व्रत के नाम से किया जाता है। ज्येष्ठ मास के व्रतों में वट सावित्री एक प्रभावी व्रत है। इसमें वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं अपने अखण्ड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए यह व्रत करती है। सौभाग्यवती महिलाएं श्रृद्धा के साथ ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन तक उपवास रखती है। त्रयोदशी के दिन वट वृक्ष के नीचे व्रत का इस प्रकार संकल्प लेती हैं।
सत्यवत्ससावित्रीप्रीत्यर्थ च वट सावित्री व्रतमहं करिष्ये।
मम वैधव्यादिसकल दोष परिहारार्थ ब्रह्म सावित्री प्रीत्यर्थ।। इस प्रकार संकल्प कर यदि तीन दिन उपवास करने के सामर्थ्य न हो तो त्रयोदशी को रात्रि भोजन, चतुर्दशी को अयाचित तथा अमावस्या को उपवास करके प्रतिपदा को धारण करना चाहिए।
यम ने अत्यन्त सन्तुष्ट होकर सावित्री के सतीत्व के प्रभाव से सत्यवान के प्राणों को अपने पास से मुक्त कर दिया। सतीत्व के प्रभाव से यह एक नवीन प्रारब्ध बन गया। इस प्रकार सावित्री ने अपने सुहाग की रक्षा की तथा अपने पातित्रत्य से पतिकुल और पितृ कुल दोनों को सुखी बनाया। पतिव्रताओं की अमोघ शक्ति को उसने जगत के सामने उपस्थित किया।
वातावरण को शुद्ध करने में वट वृक्ष का विशेष महत्व है।वट वृक्ष की औषधि के रूप में उपयोगिता से सभी परिचित हैं जैसे – वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है,उसी प्रकार दीर्घ आयु, अक्षय सौभाग्य तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है।








