साधना के सोपान” विषय पर गोष्ठी संपन्न ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम ही सोपान है- अनिता रेलन

नैनीताल l केन्द्रीय आर्य युवक परिषद् के तत्वावधान में “साधना के सोपान” विषय पर ऑनलाईन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कोरोना काल से 560 वां वेबिनार था।

वैदिक विदुषी अनिता रेलन ने कहा कि जीवन आस्था है,शक्ति है,अभिव्यक्ति है,साधना है,जीवन यज्ञ है।उसी जीवन को सार्थक बनाने के लिए हमारे ऋषियों द्वारा चार वर्णाश्रमों का प्रावधान किया गया है।उन्होंने बताया पहला आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम,मन वचन कर्म से समस्त इंद्रियों का संयम करना उन्होंने बताया कि ब्रह्मचर्य की साधना के लिए साधक को अपने भोजन पर भी विचार करना चाहिए।जैसा खाएंगे अन्न वैसा बनेगा मन सात्विक भोजन हमारी साधना का आधार है,दूसरा आश्रम गृहस्थ जीवन में प्रवेश के लिए विवाह होना आवश्यक है जिसका अभिप्राय है एक दूसरे के उत्तरदायित्व को वहन करना विवाह जीवन का केन्द्रीकरण है मनुष्य भोग विलासिता भौतिक सुखों में ना खोया रहे उसके लिए तीसरे आश्रम का वर्णन किया गया वानप्रस्थाश्रम अर्थात दुनियां में रहो किंतु धीरे-धीरे उससे ऊपर उठना शुरू कर दो इन तीनों आश्रमों से गुजरने के बाद अंतिम आश्रम आता है सन्यास जो मानव जीवन का चरम शिखर है जिसे मोक्ष की संज्ञा भी दी गई है आवागमन के बंधन से मुक्त होना उन्होंने इस विषय पर कई दृष्टांत भी बताए कुछ कुछ उदाहरणों के द्वारा चारों आश्रमों की अवस्थाओं के बारे में वर्णन किया विवेकानन्द जी की पुस्तक राजयोग के साथ योग के उद्धरण के साथ भगवान बुद्ध के उदाहरणों के साथ उन्होंने इस विषय पर गंभीरता से अपने विचार रखे।साधना के सोपान अर्थात आत्मा उन्नति हमारा पहला सोपान है आत्म शोधन बहुत जरूरी है परहित की भावना को लेते हुए उन्होंने बताया मानव जीवन का दूसरा सोपान यही सेवा है जहां से शुरू होता है तीसरा सोपान अपनी उस सेवा की परिधि को विस्तार देना भगवान बुद्ध ने जीवन जीने की कला सिखाई।बस आवश्यकता है अपने मन को जगाने की इस सोपान के बाद मानव उस सोपान पर चढ़ता है जिससे उसका समस्त ब्रह्मांड के साथ एकात्मक स्थापित हो जाता है।तुलसीदास जी की रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए परहित सरिस धर्म नहिं भाई पर पीड़ा सम नहीं आदिमाई यह भी आगे बताया गया है।आज मानव उपरोक्त मंत्र को भूल चुका है दुखों को आमंत्रित कर रहा है चारों और दूषित वातावरण पनप रहा है उन्होंने बताया है जीवन के धर्म के सोपान हमारे समक्ष खोलें यदि आंख खोल कर उस पर चढ़ना शुरू कर दें तो हमारा अपना हमारे समाज का और दुनियां का कायाकल्प हो सकता है।निष्कर्ष के तौर पर केन्द्रीय मन को तीक्ष्ण करती है विश्राम मन को विस्तृत
इनका संतुलन पूर्णता लाता है तभी दिव्यता का उदय होता है।विस्तृत चेतना है शांति और आनंद केन्द्रित चेतना है प्रेम और सृजनशीलता।केन्द्रीय चेतना का एक बिंदु जीवात्मा है इस पर ध्यान देना ही साधना है साधना के इन सोपानों को पार करना ही आध्यात्मिकता का चरम बिंदु है।

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मुख्य अतिथि आर्य नेत्री विजय खुल्लर व रजनी गर्ग ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए जीवन यात्रा को निर्लेप रहकर पूरा करने का आह्वान किया।

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केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

गयिका प्रवीणा ठक्कर, रविन्द्र गुप्ता, सुनीता अरोड़ा, जनक अरोड़ा, कमला हंस आदि के मधुर भजन हुए।

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