प्रशासन द्वारा प्रताड़ित व्यापारियों की एक अपील

नैनीताल l उत्तराखंड में सरकार सड़क के किनारे ढाबा रेस्टोरेंट से लेकर छोटे छोटे दुकानदारों को अतिक्रमण के नाम पर उजाड़ने में तुली हुई है। न्यायालय के आदेश पर प्रदेश में एक साथ यह कार्यवाई की जा रही है। सड़क किनारे की दुकानों, आवासीय भवनों कच्चे पक्के निमार्ण को चिन्हित किया जा रहा है। अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र के दुकानदार इस वक्त इस अतिक्रमण हटाओ अभियान की चपेट में हैं। पूरे ग्रामीण और छोटे कस्बे इस अतिक्रमण हटाओ अभियान की चपेट में आ रहे हैं।

पूरे प्रदेश के तेरह जिलों में लगभग पच्चीस हजार से ज्यादा दुकानें और आवासीय भवन सरकार के इस अभियान की चपेट में आ सकते हैं। इन ढाबों, रेस्टोरेंट व दुकानों के मालिक व काम करने वाले लगभग एक लाख लोग और इनके परिवार पर इसका सीधा असर होगा। इन सब लोगों का रोजगार सीधे छीन सकता है। कई लोगों ने रोजगार के लिए बैंकों से उधार लिया है। उनका क्या होगा ? इन व्यवसायियों के पास बिजली पानी के कनेक्शन हैं. फूड लाइसेंस है. वे किसी न किसी कानून के तहत तो व्यापार कर रहे होगें। इन छोटे व्यापारियों से जिला पंचायत और नगर पालिका टैक्स वसूलती है। कुछ व्यापारी तो GST भी अदा करते हैं। सरकार इन्हें कैसे उजाड़ सकती है ? पहाड़ी जिलों में सड़क के किनारे दुकान या ढाबा खोलना रोजगार का सबसे बड़ा साधन है। सरकार रोजगार के इसी साधन पर डाका डाल रही है। आज के दौर में सरकारी और फोज की नोकरियां लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे समय में स्थानीय लोगों को अन्य रोजगार मिल पाना लगभग असंभव है। इससे पहाड़ में पलायन बढ़ेगा और पहाड़ के गांव खाली होगें। पहाड़ो में सड़कें ही इस प्रकार बनायी जाती हैं कि सड़क से बहुत दूर दुकानें खोल पाना नामुमकिन होता है। इसलिए अधिकांश दुकानें और मकान सड़क के पास ही बनाये जाते हैं। पहाड़ी जिलों की अधिकांश जमीन वन भूमि है। यहां लगभग 71% वन भूमि 10% वन पंचायत कि जमीनें है। समतल और अधिकांश नाप जमीन मैदानी जिलों में है। ऐसे हालत में पहाड़ों में खेती, बागान, व्यापार के लिए 10% से भी कम जमीन उपलब्ध है। इसीलिए यहां के लिए लोग सैकड़ो साल से वन भूमि में रहकर ही गुजर-बसर कर रहे हैं। वन गुर्जरों से लेकर बिन्दुखत्ता, दमुआंगां चिडियापुर वन क्षेत्रे में लाखों लोग बरसों से रह रहे हैं। उत्तराखण्ड में भू-कानून आज भी स्पष्ट नहीं हैं। जो लोग इन जगहों पर रहकर अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं उनमें से अधिकांश उत्तराखण्ड के मूल निवासी हैं। प्राचीन काल में सभ्यताएं नदियों के किनारे ही आबाद होती थी। आज के विकासशील युग सारे बसासतें और व्यापार सड़कों के किनारे ही होता है। दूरस्थ सड़क विहीन ग्रामीण क्षेत्रों से भी पलायन नजदीक सड़क के किनारे सुगम स्थानों पर हो रहा है।