पर्यावरणीय आंदोलनों के इतिहास को समझने के लिए स्थानीय आख्यानों और मौखिक परंपराओं का अध्ययन आवश्यक: पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक

नैनीताल, । कुमाऊँ विश्वविद्यालय के यूजीसी-मालवीय मिशन-टीचर ट्रेनिंग सेंटर द्वारा आयोजित “इतिहास में समकालीन प्रवृत्तियाँ और उभरते परिप्रेक्ष्य” विषयक रिफ्रेशर कोर्स में देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षकों को इतिहास लेखन की नवीन पद्धतियों, स्रोतों और समकालीन ऐतिहासिक विमर्श से परिचित कराया जा रहा है। 21 सितंबर से 5 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस रिफ्रेशर कोर्स का उद्घाटन पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने किया।
कार्यक्रम के तीसरे दिन प्रसिद्ध इतिहासकार एवं पर्यावरण इतिहास के अध्येता पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक ने “ऐतिहासिक स्रोत के रूप में मौखिक परंपराएँ एवं व्यक्तिगत आख्यान”, “सांस्कृतिक विरासत एवं स्थानीय इतिहास” तथा “पारिस्थितिक इतिहास, संरक्षण एवं भारत में पर्यावरणीय आंदोलन” विषयों पर विस्तृत व्याख्यान दिए।
प्रो. पाठक ने कहा कि इतिहास केवल लिखित दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। मौखिक परंपराएँ, व्यक्तिगत अनुभव, स्थानीय स्मृतियाँ, लोक आख्यान और समुदायों की सामूहिक स्मृति इतिहास को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। विशेषकर स्थानीय और पर्यावरणीय इतिहास के अध्ययन में इन स्रोतों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने प्रतिभागियों को स्थानीय इतिहास को व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से जोड़कर देखने का आह्वान किया।
पर्यावरणीय आंदोलनों के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा करते हुए प्रो. पाठक ने भारत में वन, जल, भूमि और पर्वतीय पारिस्थितिकी के संरक्षण से जुड़े जनआंदोलनों को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के साथ जोड़कर समझाया। उन्होंने औपनिवेशिक काल और देशी रियासतों में हुए वन एवं जन प्रतिरोधों से लेकर आधुनिक पर्यावरण आंदोलनों तक की ऐतिहासिक यात्रा पर प्रकाश डाला।
उन्होंने तिलाड़ी आंदोलन, बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी प्रतिरोध तथा पूर्वोत्तर भारत के आंदोलनों का उल्लेख करते हुए बताया कि प्राकृतिक संसाधनों पर समुदायों के अधिकार और उनके संरक्षण का प्रश्न लंबे समय से सामाजिक संघर्षों का हिस्सा रहा है। आधुनिक काल के संदर्भ में उन्होंने चिपको आंदोलन (1973), अप्पिको आंदोलन, नर्मदा आंदोलन (1985), टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन तथा ‘हिमालय बचाओ’ अभियान जैसे आंदोलनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर चर्चा की।
अपने व्याख्यान में उन्होंने साइलेंट वैली आंदोलन, कुंतीपुझा नदी, विष्णुप्रयाग-विष्णुगंगा क्षेत्र, तथा सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में पर्यावरणीय आंदोलनों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि हिमालय और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में विकास, स्थानीय आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के बीच संबंधों को ऐतिहासिक दृष्टि से समझना आवश्यक है।
प्रो. पाठक ने अरावली पर्वतमाला के संदर्भ में उसके पारिस्थितिक महत्व तथा संरक्षण से जुड़े प्रश्नों पर भी चर्चा की। उन्होंने सेव वेस्टर्न घाट्स आंदोलन, 1980 के दशक के जनअभियानों, केरल शास्त्र साहित्य परिषद (केएसएसपी) तथा पर्यावरणीय अध्ययन से जुड़े विभिन्न प्रयासों का उल्लेख करते हुए माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट (2011) और उसके बाद सामने आए कस्तूरीरंगन समिति के दृष्टिकोण पर भी चर्चा की। केरल में आई बाढ़ों और वायनाड क्षेत्र में पर्यावरणीय संवेदनशीलता से जुड़े प्रश्नों को भी उन्होंने इसी व्यापक संदर्भ में देखा।
उत्तराखंड के संदर्भ में उन्होंने 2007 के नदी बचाओ आंदोलनों, झारखंड के सिंहभूम वन आंदोलन (1978) तथा देश के अन्य हिस्सों में जंगल और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए हुए जनप्रतिरोधों को स्थानीय समुदायों के अनुभवों के माध्यम से समझाया। उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी (2–3 दिसंबर 1984) के बाद हुए जनआंदोलन तथा औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्नों पर भी चर्चा की।
उन्होंने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में चल रहे वन संरक्षण आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्य भारत के वन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका, संस्कृति और पारिस्थितिक संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने अरावली और मध्य भारत के वनों को महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र के रूप में समझने की आवश्यकता पर बल दिया।
रिफ्रेशर कोर्स का मुख्य विषय “इतिहास में समकालीन प्रवृत्तियाँ और उभरते परिप्रेक्ष्य” है। इसके अंतर्गत ऐतिहासिक शोध की नवीन पद्धतियाँ, पर्यावरण एवं जलवायु इतिहास, जेंडर एवं सामाजिक इतिहास, डिजिटल इतिहास एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मौखिक इतिहास एवं स्मृति अध्ययन, सबाल्टर्न एवं वंचित समुदायों के इतिहास, सार्वजनिक इतिहास एवं विरासत, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन, इतिहासलेखन एवं उभरते सैद्धांतिक दृष्टिकोण तथा अंतर्विषयक शोध पद्धतियों जैसे विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए जा रहे हैं।
रिफ्रेशर कोर्स में 15 राज्यों के 49 सहायक प्राध्यापक प्रतिभागी के रूप में शामिल हैं। आगामी दिनों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों के प्रतिष्ठित इतिहासकार और विषय विशेषज्ञ इतिहास लेखन की बदलती प्रवृत्तियों, नवीन स्रोतों और शोध पद्धतियों पर प्रतिभागियों से संवाद करेंगे।

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