जय माँ नंदा- सुनंदा..

तैयारी मायके से ससुराल की……….
बेटियों के मायके आ जाने पर,
महकने लगता है
घर,आंगन और ह्रदय ।
आगमन माँ नंदा- सुनंदा ,
प्रफुल्लित कण- कण।
तोरण- द्वार, ध्वज- पताकाएं,
ढोल- दमुवे की थाप के बीच,
लहराता मशकबीन, संस्कृति और परंपराओं का उत्सव है।
माँ, बहन, बेटी
अलग- अलग रूपों में
मानते हैं,
भाव- विभोर ये मायकेवासी ।
सरोवर- नगरी अद्भुद आकर्षण लिए,
जब गुंज उठी जयकारो से,
तब सूरज की हर किरण,
लहरों से खेलती सजाने लगी दीप सृजन- तुलिका सी।
बहुत दिन कहाँ रुक पाती है बेटियां, मायके में,
अक्षत परख कर, ये नम आंखें,
इंतजार में रहेंगी फिर इसी महीने अगले साल।
जाने लगे हैं निषाण, ढोल- दमुवे की थाप के बीच,
सभी को भेटती माँ नंदा- सुनंदा जाने लगी ससुराल।
- अनुपम उपाध्याय
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