श्री मां नयना देवी मंदिर नैनीताल में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का द्वितीय दिवस। दिनांक १६ जून २०२६.
नैनीताल। .अब ना बनी तो फिर ना बनेगी,नर तन बार बार नहीं मिलता।जननी तेरी तुझे फिर ना जनेगी,नर तन बार बार नहीं मिलता….।
बृजमोहन जोशी, नैनीताल।
श्री मां नयना देवी जन्म शताब्दी समारोह के शुभ अवसर पर श्री मां नयना देवी अमर उदय ट्रस्ट द्वारा दिनांक १५ जून से २३ जून २०२६ तक आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के आज द्वितीय दिवस प्रातः विधिवत पूजन अर्चन आचार्य – मोहन चंद त्रिपाठी सामवेदाचार्य, ब्रह्मा- मुकेश चन्द्र जोशी (शास्त्री), उप व्यास – गिरीश चंद्र तिवारी, तथा व्यास- पण्डित चन्द्रशेखर अधिकारी जी द्वारा किया गया।
आज के यजमानों में मुख्य यजमान – श्रीमती देवन चौधरी एवं श्री मनोज चौधरी।
श्री मद्भागवत कथा के आज द्वितीय दिवस का शुभारंभ व्यास जी पण्डित चन्द्रशेखर अधिकारी जी द्वारा मंगलाचरण के साथ आरंभ किया गया।
व्यास जी के कल के प्रसंग से आज की कथा का आरम्भ बहुत ही सुन्दर भजन-
हे मातु तुम्हारी जय जय हो,जगदम्बे तुम्हारी जय जय हो..से कल की विश्राम कथा से आगे की कथा को सुनाना आरम्भ किया।
व्यास जी ने उत्तराखंड की महिमा का बखान करते हुए यहां के शिवालयों, देवालयों यहां के लोक देवी देवताओं का भी स्मरण किया।
रामचरितमानस की महिमा का बखान किया तथा गोस्वामी तुलसीदास जी ने किस तरह संघ और परिवेश की महिमा का गान इस चौपाई में किया है उसे गाकर सुनाया – गगन चढ़ई रज पवन प्रसंगा,किरहि मिलहि नीच जल संगा। व्यास जी ने कहा कि बीना विश्वास के भक्ति हो ही नहीं सकती। जहां ज्ञान शून्य हो जाता है वहीं से भक्ति आरम्भ होती है। हममें शबरी,मीरा,भक्त प्रहलाद जैसा भाव होना चाहिए। विश्वास होना चाहिए। अटूट विश्वास होना चाहिए।
गौरा महेश्वर के वरदान से महर्षि व्यास जी को यज्ञ कुंड से शुकदेव जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई। इस कथा को विस्तार पूर्वक सुनाया। इसके साथ साथ संस्कारों का वर्णन करते हुए शिक्षा के उद्देश्य को बतलाया,गरूकुल के महत्व पर प्रकाश डाला। व्यास जी ने शुकदेव जी को आश्रम में ही शिक्षा दी। शुकदेव व्यास नन्दन है। चारों आश्रम का वर्णन करते हुए गृहस्थ आश्रम की महिमा का वर्णन किया। विवाह संस्कार के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी लेने के लिए शुकदेव जी को राजा जनक जी के पास भेजा। राजा जनक जी से विवाह की महिमा को जानकर शुकदेव जी विवाह के बन्धन में बंधे। व्यास जी ने कहा कि पिता का ही रूप होता है पुत्र।
इसी प्रसंग को हरि ॐ
शरण जी के गाये भजन को गाकर सुनाया –
अब ना बनी तो फिर ना बनेगी,नर तन बार बार नहीं मिलता।जननी तेरी तुझे फिर ना जनेगी,नर तन बार बार नहीं मिलता।।
इसके बाद पाण्डवों और कौरवों की कथा का वर्णन किया।
व्यास जी ने कहा कि इस संसार में जितने जैसा चश्मा पहना है उसे वैसा ही दिखता है। हमारे नेत्र दूषित हो गये है। व्यास जी ने कहा कि धर्म का अर्थ ही ईश्वर है।हम भक्त हैं या बन रहे हैं या भक्त होने का नाटक कर रहे हैं,भीतर से हो रहे हैं, यहीं हमारे जीवन में अभाव का कारण है।
इसके बाद केदारनाथ तथा बदरी नाथ धाम की जानकारी दी। व्यास जी ने कहा कि इस बदरी नाथ धाम को इस भूमि को “भू बैकुंठ “भी कहते हैं। अवतार और जन्म के अर्थ को समझाया।उन शब्दों की व्याख्या की। व्यास जी ने कहा कि भगवान के लिए अवतार शब्द तथा मनुष्य के लिए जन्म शब्द का प्रयोग किया जाता है। व्रत और उपवास में आहार की जानकारी के साथ साथ एकादशी के व्रत का माहात्म्य समझाया कि एकादशी का व्रत भगवान के लिए किया जाता है निराहार रहकर,मौन रहकर।व्रत का अर्थ है भगवान के समीप बने रहना।और श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ साधना। मनुष्य का अभिमान है जो उसे ज्ञात नहीं होता,उसे सचेत रहना चाहिए।
इसके बाद राजा परीक्षित की कथा आरम्भ की तथा उसके राज्य में कलियुग के आ जाने की कथा के प्रसंग से आज कि कथा को विश्राम दिया।
संगीत के कलाकारों के द्वारा समय-समय पर कथा के आरम्भ में तथा कथा के मध्य तथा कथा के विश्राम के बाद भी सुंदर सुंदर भजनों का गायन किया गया।संगीत कलाकारों में लोकेश पंत, पण्डित राधा कान्त शर्मा, कपिल जी ने सहभागिता की।
इस शुभ अवसर पर श्री मां नयना देवी अमर उदय ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव लोचन साह जी, घनश्याम लाल साह, प्रदीप शाह, हेमंत साह,किशन सिंह नेगी, शैलेन्द्र मिलकानी,शैलेश साह,आचार्य बसन्त बल्लभ पाण्डे, बसन्त बल्लभ जोशी, चन्द्र शेखर तिवारी,नवीन तिवारी,भुवन काण्डपाल,गणेश बहुगुणा,अमिता साह,सुमन साह,मंजु रौतेला,राजीव दूबे ,पान सिंह ढैला आदि उपस्थित रहे।











