अक्षय तृतीय विशेष


अक्षय का अर्थ “अविनाशी,” “शाश्वत,” “अमर” या “जो कभी नष्ट न हो” (अ + क्षय) होता है। यह संस्कृत से लिया गया शब्द है जो स्थायित्व, लचीलापन और अटूट जीवंतता का प्रतीक के साथ भगवान विष्णु से भी जुड़ा है।
तृतीया’ का “तीसरा” होता है। पंचांग के अनुसार हर महीने के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की तीसरी तिथि को दर्शाता है। इसे ‘तीज’ के नाम से भी जाना जाता है।
अक्षय तृतीया (अखा तीज) पावन और शुभ त्यौहार है, जो वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है। 2026 में यह 19 अप्रैल को है। ‘ इस दिन दान, स्नान, और जप का फल अनंत मिलता है। इसे अबूझ मुहूर्त माना जाता है, जिसमें बिना पंचांग देखे नए कार्य, विवाह और सोना-चांदी खरीदना शुभ होता है।
यह 19 अप्रैल 2026 को सुबह 10:49 से शुरू होकर 20 अप्रैल की सुबह 7:49 बजे तक रहेगी। पुराण अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने परशुराम अवतार लिया था, त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था, और माता गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं।अक्षय तृतीया पर भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जिससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता तथा इस दिन अन्न, जल, वस्त्र और जौ का दान करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन सोना खरीदने से घर में संपन्नता आती है। नया व्यवसाय या शुभ कार्य शुरू करने के लिए यह दिन सर्वोत्तम है।
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता है।
अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्र होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि उपज आदि के शगुन देखते हैं।
सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।
दानकाले च सर्वत्र मन्त्र मेत मुदीरयेत्॥
सभी महीनों की तृतीया में श्वेत पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।
ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।
भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृन्दावन स्थित श्री बाँके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था होता। मदनरत्न के अनुसार:
“ अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥ सभी को बधाई डॉ ललित तिवारी