पितृ पक्ष विशेष

भारतीय संस्कृति की विशेष पहचान पूर्वजों का सम्मान है । भाद्रपद तथा अश्विन माह में
पितृपक्ष जिसे पितरपख भी कहते है , 16 दिन की वह अ वधि है जिसमें हिन्दू लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक श्राद्ध के माध्यम से पिंड दान तथा पताई के माध्यम से भोजन भेट कर उनका स्मरण करते हैं। इसे ‘सोलह श्राद्ध’, ‘महालय पक्ष’, ‘अपर पक्ष’ भी कहते है । भगवद गीता के अध्याय ९ श्लोक २५ के अनुसार पितर पूजने वाले पितरों को, देेव पूजने वाले देवताओं को और परमात्मा को पूजन करने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं।
पुराण कहते है कि पितृपक्ष 16 दिनों की वह पवित्र अवधि है जहां पितरों की आत्माओं की शांति एवं कृतज्ञता हेतु वंशज उन्हें याद कर उनका आशीर्वाद लेते है । पितृपक्ष में पितरों का तर्पण और पिंडदान धार्मिक कर्तव्य भी है जिससे पितृदोष से मुक्ति भी मिलती है ।
गरुड़ पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, पितृपक्ष में पितरों की आत्माएं मृत्युलोक में अपने वंशजों के पास आती हैं।
पुराणों में पितृपक्ष को शुभ और पवित्र काल बताया गया है। यह पितृ देवों को सम्मान देने का अवसर है
पितृ पक्ष जिसे संस्कृत में : पितृ पक्ष , अर्थात ‘पैतृक पूर्वजों का पखवाड़ा’ , जिसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है, हिंदू कैलेंडर में 16 चंद्र दिन की अवधि है जब हिंदू अपने पूर्वजों ( पितृ ) को विशेष रूप से भोजन प्रसाद के माध्यम से श्रद्धांजलि देते हैं । पितृ पक्ष के दौरान केवल खान-पान ही नहीं बल्कि जीवनशैली में सावधानी ,नया काम शुरू करना ,नए कपड़े खरीदना और पहनना वर्जित है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में पूर्वज धरती पर आकर परिजनों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृ पक्ष में मृत माताओं का श्राद्ध नवमी के दिन होता है। यह तिथि उन सभी महिलाओं के लिए श्राद्ध कर्म करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है ।
अंतिम श्राद्ध, जिसे सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या कहते हैं, पितृ पक्ष का समापन होता है, जब सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है. यह पितृ पक्ष के अंतिम दिन मनाया जाता है और इसका उद्देश्य पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना है. इस वर्ष पितृ पक्ष 21 सितंबर, 2025 को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा । श्राद्ध में प्रयुक्त होने वाली सामग्री में प्राकृतिक उत्पाद जिसमें काला तिल, जौ, चावल, कुश, गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद, फूल, फल , पान-सुपारी, जनेऊ, रोली-हल्दी, दीपक, अगरबत्ती, गाय का दूध ,तिमला ,बेडू के पत्ते ,कुश , दारिम मेथी तथा अनार ,पक्के चावल, जौ का आटा,ककड़ी का रायता ,पाती के पत्ते ,आवले के पत्ते का प्रयोग पितरों को प्रसन्न करने और तर्पण व पिंडदान करने के लिए प्रयुक्त होती है।
श्राद्ध पक्ष में पीपल, बरगद, तुलसी, अशोक, और बेल के पेड़-पौधे लगाना शुभ है । इन पौधों में देवताओं का वास तथा इनकी अर्चना से पितृ प्रसन्न होते हैं. पीपल में पितरों का वास होता है, बरगद दीर्घायु और मोक्ष देने वाला है, तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है, अशोक घर में सुख-समृद्धि लाता है, और बेलपत्र भगवान शिव से संबंधित है. और उनके आशीर्वाद से परिवार में सुख-समृद्धि आती है । सभी पूर्वजों को प्रणाम है। Dr Lalit Tiwari

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