उत्तराखण्ड राज्य की रजत जयंती के स्थापना के उपलक्ष्य में पटवाडांगर संस्थान में विषेष कार्यक्रम का आयोजन, उत्तराखण्ड राज्य में मत्स्य पालन, विभिन्न प्रकार के मषरूम की खेती, बॉयोटेक्नोलॉजी, स्टार्ट अप, स्वरोजगार व मिट्टी रहित की खेती की अपार संभावनाएं।

नैनीताल l उत्तराखण्ड जैवप्रौद्योगिकी परिषद् के क्षेत्रीय केन्द्र पटवाडांगर में उत्तराखण्ड राज्य स्थापना दिवस की रजत जयंती के उपलक्ष्य में क्षेत्रीय केन्द्र पटवाडांगर के सभाागर में एक विषेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पंतनगर स्थित उत्तराखण्ड जैवप्रौद्योगिकी परिषद् मुख्यालय के निदेषक डा. संजय कुमार ने सभी प्रतिभागियों व महिला प्रषिक्षुओं व देवीधुरा ग्राम प्रधान श्रीमती प्रेमा बोरा का स्वागत करने हुए कहा कि राज्य की स्थापना के बाद 25 वर्षाें बाद उत्तराखण्ड ने अभूतपूर्व प्रगति की है, व विषेषकार विपरीत परिस्थितियों के बावजूद रोजगार के विभिन्न अवसर उत्पन्न हुए हैं जैसे स्वरोजगार व स्टार्ट अप्स् इत्यादि। डा. संजय कुमार ने आह्वान किया कि किसान व्यवसाय को छोटे स्तर पर शुरू कर आगे चल कर अपनी आय कई गुणा बड़ा सकते हैं। डा. संजय कुमार ने पटवाडांगर केन्द्र में संचालित विभिन्न शोध परियोजनाओं व पॉलीहाउस में विकसित की जा रही विभिन्न प्रजाति की सब्जियां व पालक के बार में जानकारी दी। डा. संजय कुमार ने प्रतिभागियो से कृषि को बढ़ावा देने हेतु आहवान किया क्योंकि देष की अर्थव्यवस्था अभी भी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है।
तदुपरांत पंतनगर विष्वविद्यालय के मत्स्य महाविद्यालय के प्राध्यापक डा. आषुतोष मिश्रा ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों मंे पानी की कमी के बावजूद विकसित की गई नई तकनीकों द्वारा मत्स्य पालन कर अपनी आय बड़ा सकते हैं जिसमें विज्ञान का बहुत अहम योगदान है। जिसमें कृत्रिम मछली के टैंको क्रमषः बॉयाफ्लॉक, एकवॉपोनिक तकनीक एवं एफआरवी टैंक को किसान अपने घरों में इन जल संचय तकनीक स्थापित कर 1000 लीटर पानी से कम से कम एक किग्रा की विभिन्न प्रकार की मछली प्रति यूनिट विकसित कर सकते हैं जिसमें ग्रास कॉर्प, सिलवार कार्प, कॉमन कॉर्प शामिल हैं। डा. मिश्रा ने कहा कि उक्त प्रजाति की मछलियां को उत्पादन कर किसान अपनी आय कई गुना बढ़ा सकते हैं। डा. मिश्रा ने मछलियों के भोजन के संबंध में विस्तार से चर्चा की व कहा कि बरसात के मौसम में मछलियों की संख्या का अधिक उत्पादन होता है। डा. मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि 100 स्क्वॉयर मीटर में लगभग 400 मछलियों का उत्पादन किया जा सकता है। डा. मिश्रा ने कहा कि मछलियों में बीमारियों के रोथाम में चूने का कॉफी महत्व है। इसके अतिरिक्त मछलियों के तालाब का सूक्ष्म तत्वों से भरपूर होने के कारण यह पानी पौधों की सिंचाई मंे काफी जिससे पौधों की वृद्धि काफी तेजी से होती है। इसके अलावा मछली में काफी पोषक तत्वों पाये जाते हैं जिसमें मुख्यतः ओमेगा 3 फैटी एसिड्स पाए जाते हैं एवं अन्य अति आवष्यक पोषक तत्व पाये जाते हैं। जो मानव स्वास्थ्य के लिए काफी लाभदायक हैं।
तदुपरांत पंतनगर विष्वविद्यालय के कृषि महाविद्यालय के पादप रोग विभाग के प्राध्यापक डा. एसके मिश्रा ने पोषण वाटिका के सिद्धांत पर प्रकाष डाला। डा. मिश्रा ने प्रतिभागियों से मषरूम उत्पादन करने का आह्वान किया। डा. मिश्रा ने मषरूम उत्पादन की विभिन्न विधियों पर चर्चा की व कहा कि मषरूम को भोजन में शामिल करने पर इस की महत्ता पर प्रकाष डाला। डा. मिश्रा ने कहा कि मषरूम की चाय लेने से कई असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। डा. मिश्रा ने बटन, गोल, मिलकी इत्यादि विभिन्न प्रकार के मषरूम के बारे मंे चर्चा की व कहा कि बेहतर गुणवत्ता के मषरूम के उत्पादन हेतु उचित मात्रा में नमी व छाया की आवष्यकता होती है। इसमें मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सूक्ष्म तत्व पाये जाते हैं
इसी क्रम में हल्द्वानी से आए मधुमक्खी पालन के विषेषज्ञ श्री संजीव जोषी ने पहाड़ी क्षेत्रों में पायी जाने वाली मधुमक्खी के व्यवहार व मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके प्रभाव व इसके शहद की गुणवत्ता पर विषेष चर्चा की। श्री जोषी ने मधुमक्खी के छत्तों, मोम, पराग कण, प्रोफोलिस, रॉयल जेली व मधुमक्खी के डंक के जहर की महत्ता पर चर्चा की। श्री जोषी ने कहा मधु मक्खी के शहद बनने में सही मात्रा में फूलों व शहद के उत्पादन के लिए उपयुक्त वनस्पति व वातावरण का होना आवष्यकता होती है जिसमें उधारण के तौर पर जामुन व सरसों के पेड़ इत्यादि है। इसके उपरांत पंतनगर विष्विद्यालय के निदेषक, संचार डा. जेपी जयसवाल ने वोकल फॉर लोकल के नारे पर प्रकाष डाला। डा. जयसवाल ने कहा कि कड़ी मेहनत व वैज्ञानिक शोध कार्याें से ही भारत एक विकसित राष्ट्र बन पायेगा। डा. जयसवाल ने कहा कि प्लांट टिष्यू कल्चर तकनीक से हम किसी भी प्रकार के पाधौं उनके विभिन्न पार्टस् लेकर काफी संख्या में उच्च गुणवत्ता के पौधे विकसित कर सकते हैं। डा. जयसवाल ने परिषद् के निदेषक डा. संजय कुमार को इस प्ररिषक्षण कार्यक्रम अयोजित कराने पर शुभकामनाएं दी व पोषण वाटिका के सिद्धांत वाले भोजन पर पुनः बल दिया जिसमें मनुष्यों में बीमारियां नियंत्रित रहती है व आयु भी लम्बी होती है।
कार्यक्रम के अंत में पटवाडांगर संस्थान के प्रभारी डा. सुमित पुरोहित ने पटवाडांगर केन्द्र मे टिष्यू कल्चर प्रयोगषाला में विकसित की जा रही कीवी फल के पौधे व तिमूर इत्यादि के बारे में विस्तृत से सभी को अवगत कराया व बॉयोइन्नोवेषन सेंटर में उत्पादित किये जा रहे विभिन्न प्रकार के मषरूम की प्रजाति की जानकारी दी। साथ ही डा. पुरोहित ने हाईटेक पॉलीहाउस में विकसित की जा रही 30 सेमी पालक व चेरी टमाटर, ब्रोकोली इत्यादि के बारे में जानकारी दी व भविष्य में किये जाने वाले शोध एवं विकास कार्याें के बारें सभी को अवगत कराया। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी अंजू डोसाद ने किया। ग्राम प्रधान श्रीमती प्रेमा बर्गली व श्रीमती विनीता बोरा के मार्गदर्षन में लगभग 40 महिलाओं व प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। इस अवसर पर पटवाडांगर केन्द्र की शोधार्थी मेहक बेलवाल, प्रीती बहुगुणा, शुभांगी रौतेला, लैब एनालिस्ट श्री ललित असवाल, श्री अजय सिंह, प्रयोगषाला सहायक काजल, नलिनि, मानसी, नितिन, सौरभ व संस्थान के अन्य कर्मचारी उपस्थित थे।

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