संस्कृति अंक।दिनांक ०५-०६-२०२५श्री गंगा दशहरा ” दशौर”गंगा के अवतण का पर्वआलेख -बृजमोहन जोशी।


आज दिनांक ०५-०६-२०२५ को श्री गंगा दशहरा मनाया जाना शास्त्र सम्मत है।
भारतीय संस्कृति में नदियों को मां के समान आदर दिया जाता है। कुम्भ – महाकुंभ जैसे पर्व नदियों के तट पर ही आयोजित होते हैं। जिसमें मां गंगा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जो कि धरती पर ही नहीं आकाश, पाताल में भी अवतरित होती है । इसीलिए श्री मां गंगा को त्रिपथ गामिनी भी कहा जाता है।
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में यह पर्व खास स्वरूप में मनाया जाता है, क्योंकि गंगा का अवतरण इसी क्षेत्र में हुआ था। खास तौर से कुमाऊं क्षेत्र में आज भी गंगा दशहरा लोक पर्व के दिन कुमाऊंनी पारम्परिक लोक चित्रकला के अन्तर्गत इस दिन कुल पुरोहितों/ब्राह्मणों के द्वारा स्वनिर्मित ‘द्वार पत्र’ (दशौर) का निर्माण किया जाता है।और इस आलेखन द्वार पत्र को प्रतिष्ठित करके अपने अपने जजमानों को वितरित किया जाता हैं तथा गंगा दशहरा के दिन इस द्वार पत्र को भादो माह में होने वाली वर्षा में सुरक्षा कवच की तरह प्राकृतिक आपदा और वज्रपात से सुरक्षा हेतु घर में घर के मुख्य द्वार की चौखट के ऊपर लगाया जाता है। इससे अग्नि का भय भी नहीं रहता, ऐसी लोक मान्यता है।
इस कुमाऊं अंचल में यहां के ब्राह्मणों द्वारा एक वर्गाकार सफेद कागज में विभिन्न प्राकृतिक रंगों कि सहायता से शिव, गणेश, दुर्गा, सरस्वती, और मकर वाहिनी गंगा आदि का रंगीन चित्र बना कर उसके चारों ओर एक वृत्तीय या बहु वृत्तीय कमल दलों का अंकन किया जाता है जिसमें लाल, पीले, हरे रंग भरे जाते हैं और इसके बाहर एक मंत्र,वज्र निवारक जिसमें पांच ऋषियों के नाम के साथ यह श्लोक लिखा जाता हैं –
अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च। जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पञ्चैते वज्र वारका।
मुने कल्याण मित्रस्य जैमिनेश्चानु कीर्तनात ।
यह द्वार पत्र अपने आप में वास्तव में कई शक्तियां लिए हुए होता है। इसका अर्थ है कि अगस्त्य, पुलस्त्य, जैमिनी और सुमंत नामक ऋषि अपनी शक्तियों के माध्यम से भादो माह में होने वाली वर्षा से आकाशीय बिजली,वज्रपात आदि से घरों की सुरक्षा करते हैं।
दस योगों से मिलकर बनता है गंगा दशहरा।अर्थात ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष ,दशमी तिथि । आदित्य पुराण में कहा गया है कि हिमालय से गंगा का निर्गमन ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि दिन बुधवार को हस्त नक्षत्र योग में हुआ था। और यह भी कहा जाता है कि गंगा ने राजा भगीरथ से प्रसन्न होकर कहा कि यदि संसार के प्राणी मेरी पवित्रता कि रक्षा करेंगे तो मैं भी उनके दस प्रकार के पापों का हरण करने का वचन देती हूं। अतः इस तिथि को गंगा दशहरा कहा गया।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार ज्येष्ठ मास में गंगा का सेवन हितकर माना गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य रश्मियों के द्वारा धुव्र प्रदेश में द्रवीभूत जल के रूप में भी पूज्यनीय मानी गई है।
गौमुख से आने वाली भागीरथी तमाम खनिज और जड़ी बूटी को अपने में आत्मसात करती है। जिससे गंगा जल अमृत की तरह हो जाता है। एक विशेष बात अपने संकलन कार्य करते समय मुझे ज्ञात हुई कि गौमुख से देव प्रयाग तक अर्थात अलकनंदा व भागीरथी के संगम से पूर्व आज भी गंगा को उस क्षेत्र में भागीरथी के ही नाम से ही सम्बोधित किया जाता है। देव प्रयाग में अलकनंदा व भागीरथी में संगम होने के बाद ही इसका नाम गंगा हो जाता है। भगवान विष्णु के चरणोंदक होने से गंगा को वैष्णव। शिव की जटाओं में बहने से शैव।और सती का अर्ध -देह ( भाग) होने से शाक्त और तर्पण प्रिय गणेश अपनी माता की बहन गंगा को सदैव सम्मान देते हैं।
आप सभी महानुभावों को सपरिवार श्री गंगा दशहरा की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

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