डीएसबी परिसर में सांख्यिकी कार्यशाला का समापन, शोधार्थियों को दिए सांख्यिकीय तकनीकों के व्यावहारिक टिप्स

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में आयोजित सांख्यिकी कार्यशाला का मंगलवार को समापन हुआ। दूसरे दिन के चतुर्थ सत्र में प्रतिभागियों को आगमनात्मक एवं निगमनात्मक दृष्टिकोण, टी-टेस्ट, सहसंबंध, एनोवा और गैर-पैरामीट्रिक परीक्षणों की जानकारी दी गई।
सत्र की शुरुआत डॉ. वीरेंद्र प्रताप यादव ने की। उन्होंने शोध में आगमनात्मक और निगमनात्मक दृष्टिकोण की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी भी सांख्यिकीय तकनीक के प्रयोग से पहले शोध प्रश्न की स्पष्टता और उसकी तार्किकता जरूरी है। उन्होंने उचित एवं प्रतिनिधिक नमूने के चयन को शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। कहा कि जनसंख्या के संबंध में निकाले गए निष्कर्षों की विश्वसनीयता काफी हद तक नमूने की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। उन्होंने स्वतंत्र और युग्मित नमूना टी-टेस्ट को उदाहरणों के माध्यम से समझाया। साथ ही विश्वास अंतराल की अवधारणा और शोध में इसके महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद डॉ. अश्विनी कुमार ने सांख्यिकीय परीक्षणों के तार्किक आधार और महत्व स्तर की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शोध के विषय और पूर्ववर्ती साहित्य के आधार पर उपयुक्त सांख्यिकीय मानदंडों का चयन किया जाना चाहिए। उन्होंने शोध पद्धति और शोध अभिकल्प के बीच अंतर भी समझाया। समापन सत्र में डीएसबी परिसर के निदेशक एवं मुख्य अतिथि प्रो. ललित तिवारी ने कहा कि आंकड़ों की सही समझ और वैज्ञानिक विश्लेषण शोध की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है। कार्यशाला संयोजक प्रो. दीपक पालीवाल ने कहा कि कार्यशाला से प्रतिभागियों में सांख्यिकी के ज्ञान के साथ व्यावहारिक कौशल का भी विकास हुआ। डॉ. सरोज पालीवाल ने सभी प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार जताया। कार्यशाला में डॉ. पूजा जोशी पालीवाल, सुमित जोशी, कुमकुम चंद्रा, नेहा, आकांक्षा, उन्नति, रोहित जोशी, आयुष उनियाल, दीक्षा, सपना, कोमल, हर्षवर्धन पंत, नीरज तिवारी आदि रहे।













