पहाड़ की संस्कृति पर एक कविता ”काव्य-धारा” की श्रृंखला में।

काले कौवा काले……..

गले मे
घुघुति की माला
और सुबह सवेरे
बच्चो की आवाज
“काले कौवा काले, घुघुति माला खाले “
इस घर से
उस घर तक जैसे सब इंतजारी में हों।
आमा रात को ही
घुघुते तल कर
कव्वों के लिए
अलग से रख देने वाली हुवी और
बच्चों का
एक ही काम हुआ,
धात लगाना।
पहाड़ो में गूंजती आवाजें ,
परंपराओं को नदी बना अनवरत जारी रखती हैं।
महापर्व, महाअनुष्ठान और संस्कृति के रंग
ऐसे ही बने रहेंगे,
एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को जब- जब सौपेगी धरोहर,
किसी भी रूप में, चाहे घुघुतों की माला क्यों न हो,
ये थाती बची रहेगी अनंतकाल तक यूं ही।

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-अनुपम उपाध्याय

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