प्रेम बदलती अभिव्यक्ति” विषय पर गोष्ठी संपन्न प्रेम पूर्ण अस्तित्व है -अनिता रेलन

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नैनीताल l केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में “प्रेम बदलती अभिव्यक्ति” विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया।य़ह कोरोना काल से 629 वां वेबिनार था। मुख्य वक्ता अनिता रेलन
ने अपनी बात दोहे “प्रेम बिना साहित्य के उठे ना मन में भाव , पावन प्रेम पराग से बढ़ता है सद्भाव,भक्ति भाव बिना प्रेम के उपजे नहीं सुजान,भक्ति प्रेम विस्तार है जाने सकल जहान” से शुरू की।उन्होंने कहा कि प्रेम के अनेक अनेक स्वरूप है मां बेटे का प्यार,भक्त और भगवान का प्यार,गुरु शिष्य का प्यार पर यह भौतिक स्वरूप है यही भौतिक स्वरूप आध्यात्मिक प्रेम की एक छाया है प्रेम का गुण है आनंद। प्रेम करने पर आनंद प्राप्त होता है प्रेम और आनंद आत्मा का अपना गुण है यदि प्रेम व्यक्ति के गानो पर आधारित है तब वह प्रेम स्थाई नहीं होता किसी से उसकी महानता या विशेषता के लिए प्रेम करना तीसरे दर्जे का प्रेम माना जाता है प्रेम तुम्हारा स्वभाव है जो तुम्हारा स्वभाव है वह बदल नहीं सकता यह हम सब मानते हैं हमारा जो स्वभाव है वह है हम उसे बदलने की कोशिश करते हैं पर पूर्णता हम अंदर से अपने स्वभाव को बदल नहीं सकते
परंतु प्रेम की अभिव्यक्ति बदलती है वह कैसे क्योंकि प्रेम तुम्हारा स्वभाव है प्रेम के अलावा कोई चारा है ही नहीं,मां को बच्चों के लिए प्रेम है परंतु कभी उसे खिलाती है कभी सख्ती से पेश आती है यह सब वह प्रेम वश करती है।यह सभी प्रेम के विभिन्न रूप हैं अलग-अलग लोगों से मिलते हैं तो भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रेम की अभिव्यक्ति होती है अतः प्रेम की अभिव्यक्ति बदलती है परंतु प्रेम स्वयं नहीं बदलता क्योंकि प्रेम तुम्हारा स्वभाव है ध्यान रहे की प्रेम तुम्हारा स्वभाव है इसलिए नहीं बदलता।प्रेम कोई भावना नहीं है वह तो पूर्ण अस्तित्व है कहते भी है प्रेम को प्रेम ही रहने दो उसे कोई नाम ना दो जब तुम प्रेम को नाम देते हो तब वह एक संबंध बन जाता है और संबंध प्रेम को सीमित कर देता है तुममें भी और मुझमें प्रेम है बस उसे रहने दो यदि तुम प्रेम को भाई-बहन माता-पिता गुरु का नाम देते हो तब उससे संबंध बना रहे हो संबंध प्रेम को सीमित करता है केवल वही व्यक्ति सच्चा प्रेम कर सकता है जिसने त्याग किया है जिस मात्रा में तुम त्याग करते हो वही तुम्हारी प्रेम की क्षमता है सच्चा प्रेम अधिकार नहीं जताता वह स्वतंत्रता लाता है,उसमें कोई इच्छा नहीं रह जाती मुझे और कुछ नहीं चाहिए मुझे केवल प्रेम चाहिए था जो मिल गया प्रेम में और कोई इच्छा नहीं होती प्रेम और वैराग्य विपरीत प्रतीत होते हुए भी एक ही सिक्के की दो पहलू है,ऊपर कहा था प्रेम तुम्हारा स्वभाव है और प्रेम में पीड़ा उसकी प्रथम अंतर्दृष्टि है
ऊर्जा दूसरी अंतर्दृष्टि है और दिव्य प्रेम तीसरी अंतर्दृष्टि है दिव्य प्रेम की एक झलक संपूर्णता लाती है और सभी सांसारिक सुखों को तुच्छ बना देती है।चौथी अंतर्दृष्टि समाधि और पांचवी है अद्वैत के प्रति सजगता अर्थात सब कुछ बस सिर्फ एक से ही बना है
प्रेम तीन प्रकार का होता है पहला जो आकर्षण से पैदा हो दूसरा जो सुविधा के कारण उत्पन्न हो और
तीसरा प्रेम ईश्वर के प्रति प्रेम
प्रेम के अनेकानेक स्वरूप है लेकिन इसकी जो अभिव्यक्ति है हर स्थान समय के अनुसार बदलती रहती है सांसारिक प्रेम महासागर की तरह होता है पर महासागर का भी एक तल है दिव्य प्रेम आकाश की तरह होता है असीम और अनंत महासागर के तल से ऊपर उठ जाओ विशाल नभ की ओर तो आपको दिव्य प्रेम की अनुभूति होगी अंत में उन्होंने सारांश के रूप में बताया वसंत परिदृश्य में खिलता है संसार प्रेम रंग में ही छिपा इस जीवन का सार प्रेम शब्द जो जान ले वही सफल इंसान बिना प्रेम की जिंदगी जैसी रेगिस्तान। मुख्य अतिथि आर्य नेत्री ऋचा गुप्ता व अध्यक्ष ममता शर्मा ने भी अपने विचार रखे।परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया।राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया। गायिका पिंकी आर्य, कौशल्या अरोड़ा, जनक अरोड़ा, कमला हंस, सरला बजाज उषा सूद, मृदुल अग्रवाल, रविन्द्र गुप्ता के मधुर भजन हुए।

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