मकर-संक्रांति-उत्तरायणी: सांस्कृतिक-पर्वपुस्यूड़िया- घुघुतिया त्यारसूर्योपासना का पर्व हैमकर संक्रांतिऋतु परिवर्तन का पर्व हैमकर संक्रांतिआलेख व छायांकन -बृजमोहन जोशी।

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कुमाऊं में माघ मास को धर्म और पुण्य लाभ का माह माना जाता है। गंगा स्नान और ब्राह्मणों को विशेष रूप से घीं- खिचड़ी खिलाने का बड़ा महत्व है। कुमाऊं अंचल में मनाया जाने वाला यह अनूठा त्यार है, इसे ‘काले कौवा या ‘पुस्यूड़िया’ घुघुतिया त्यार भी कहा जाता है। पौष मास के मासान्त की ढाल से सरककर आई हुई माघ की संक्रांति मकर संक्रांति कहलाती है। इस पर्व के पहले दिन गर्म पानी से स्नान किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘तात्वाणी’ कहा जाता है, दूसरे दिन ठंडे पानी से स्नान किया जाता है, जिसे ‘सेवाणी’ कहा जाता है। यह शीत ऋतु के अंत का द्योतक है।सेवाणी के दिन बच्चे सवेरे ही टोलियां बनाकर सारे गांव में घूमते हैं, अपने से बड़ों को प्रणाम-पैलागन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। सभी घरों में इनका स्वागत किया जाता है और इन्हें भेंट स्वरूप गुड़ दिया जाता है। इसे प्रणाम- पैलागन कहने को जाना या गुड़ मांगने को जाना कहा जाता है, अर्थात गुड़ मांगने के बहाने बच्चों में शिष्टाचार की शिक्षा देना भी है। गुड़ व तिल तो कुमाऊं में प्रत्येक शुभ मांगलिक अवसरों पर बांटने की परंपरा है।
इस दिन, दिन में गांव के सभी लोग नगाड़े,ढोल और निशाणं लेकर गिरखेत ‘गीरा’ खेलने का स्थान की ओर चल पड़ते हैं। अलग-अलग दल बनते हैं और गीरा खेला जाता है। ‘गिटुआ’ जिस दल की अंतिम सीमा रेखा को पार कर लेता है उसे ‘हालू’ हो जाता है अर्थात वह दल हार जाता है। गिटुआ या गज्याडुं फुटबॉल की तरह है तथा उसे लूटने का खेल होता है। जिसमें बच्चे, बड़े ,और बूड़े सभी लोग अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। उसे लूटते समय नगाड़े, ढोल,दमामे नृसिंह, तुतुरी आदि लोक वाद्य-यंत्र बजते रहते हैं, गिरखेत उस समय कुरुक्षेत्र का रूप ले लेता है। यह उत्सव मनोरंजन के साथ-साथ वीरता का जीवन बिताने की प्रेरणा देता। महिलाएं भी उत्सव में भाग लेती हैं उनके सुरीले कंठ से लोक गीतों के मीठे -मीठे बोल झरने लगते हैं।गीतों का भावार्थ यह होता है कि इस तरह सदा गिरखेत में मनोरंजन के लिए और घुघुती सग्यान पर्व को मनाने के लिए आते रहने की मंगलकामना करते हुए सभी लोग अपने घर लौट आते हैं।
घर आकर आटे, गुड़, घी की सहायता से ना-ना प्रकार के व्यंजन घुघुते, ढाल,तलवार, हुड़ुका,दाड़िम का फूल आदि बनाकर उसे घीं में तलकर एक डोरी में उन्हें नारंगी सहित गूथ-कर बच्चों के लिए लंबी माला बनाते हैं।
मायके पक्ष व ससुराल पक्ष द्वारा भी घर में शीशु के लिए घुघुते की माला बनाई जाती है तथा त्यौहार के दिन उस शीशु के लिए भेंट स्वरूप भेजी जाती है। विशेष रूप से मामा के घर से आने वाली घुघुते की माला की बहन को प्रतीक्षा रहती है। प्रातः काल बच्चे घुघुते की माला पहनकर कौओं को बुलाते हैं। बागेश्वर में कहीं-कहीं प्रायः सरयू पार माघ संक्रांति की शाम को घुघुते बनाकर दूसरे दिन कौवा बुलाते हैं, तथा सरयू वार कहीं-कहीं पौष मास के मासान्त की शाम को यह त्यौहार मनाया जाता है।
तथा माघ मास की संक्रांति को प्रातः काल कौवा बुलाया जाता है कहा जाता है कि कौवा प्रातः काल बागेश्वर संगम में स्नान कर आता है, कौवा को घुघुते, लगड़-पूरी, बडा़ दिए जाते हैं। कौवा जिसका उपहार सबसे पहले ग्रहण कर ले उसे श्रेष्ठ माना जाता है, कौवे द्वारा ले जाने के बाद छिपाई गई लगड़ -पूरी आदि पकवान बच्चों के द्वारा ढूंढ -ढूंढ कर गाय के बछड़े को खिलाई जाती है क्योंकि ऐसी लोक मान्यता है, कि इस त्यौहार से लगभग 15 दिन पहले 15 गते पौष की रात 22 दिसंबर को कौवा भूख से अचेत हो जाता है तथा वह रात सबसे लंबी रात होती है। पुस्युड़िया का कौवा बहुत चाटुकारिता से मानने वाला किस्सा भी है। बच्चे प्रातः काल कागा को बुलाते हैं और यह बाल गीत-गाते हैं-
ऐजा कवा ऐजा, बांटि चुटि खैजा।उत्तरैणी ऐछा, घुघुती लये रैछा।
केवल खाने का ही नहीं वरन बटी चुटि मिल-जुलकर, मिल- बांटकर खाने का आमंत्रण और वह भी मानवेतर प्राणी के साथ कितनी अच्छी बात है।
बच्चे यह बाल गीत भी गाते हैं-
काले! काले! काले!
काले!कौवा काले।
घुघुती माला खाले।
त्यर गलणा थेचूलो, त्यर गलणा मेचूलो।
घुघूती माला खा ले।
ले कौवा पूरी मैं कैं दे भल भल दुल्हैणीं।
ले कौवा बड़ मैं कै दे सुनक घण।
काले कौवा काले, घुघूती माला खाले।
प्राचीन मान्यता है कि इस दिन कौवो को खिलाया गया यह पकवान कौवो के माध्यम से उनके पूर्वजों तक पहुंचता है। घुघुते की माला में हुड़का होता है जिसका मनोरंजन के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्व भी है। माला में बनी तलवार उसे वीर बनाएगी। ढाल उसकी रक्षा करेगी। खिलौने उसका मनोरंजन करेंगे। घुघुते खाकर बच्चे कहते हैं, घुघुते तो उड़ गए! घर के बड़े लोग भी इस खुशी में शामिल होकर अपने श्रम में लथपथ जीवन में अपूर्व आनंद का अनुभव करते हैं।

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