हनुमान जयंती। संस्कृति अंक दिनांक -१९-१०-२०२५ आलेख – बृजमोहन जोशी नैनीताल।


आश्विनस्यासिते पक्षे भूतायां च महानिशा।भौमवारेsअंजनादेवी हनूमन्तमजीजनत।।
अमान्त आश्विन (कार्तिक) कृष्ण चतुर्दशी भौमवार की महानिशा (अर्धरात्रि) में अंजना देवी के उदर से हनुमान जी का जन्म हुआ था। अतः हनुमान उपासकों को चाहिए कि वे इस दिन प्रात: स्नानादि यथा विधि से षोडशोपचार पूजन करे। पूजन के उपचारों में गन्ध पूर्ण तेल में सिंदूर मिलाकर उससे मूर्ति को चर्चित करें। पुष्प, नैवेद्य, घृत पूर्ण चूरमा या घी में से के हुए और शर्करा मिले हुए आटे का मोदक एवं केला, अमरूद,आदि फल अर्पण करके बाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का पाठ करें। रात्रि के समय घृत पूर्ण दीपकों की दीपावली का प्रदर्शन करें। यद्धपि अधिकांश उपासक इसी दिन हनुमान जयंती भी मनाते हैं और व्रत करते हैं, परन्तु शास्त्र के अनुसार – चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुमंत जन्म का उल्लेख किया गया है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जयंती मनाने का एक यह कारण भी है कि लंका विजय के बाद श्री राम अयोध्या आये। पीछे भगवान श्री राम चन्द्र जी और भगवती जानकी जी ने वानरादि को यथायोग्य पारितोषिक देकर विदा किया था। उस समय इसी दिन ( का०कृ० १४ को) सीता जी ने हनुमान जी को पहले तो अपने गले की माला पहनायी, जिसमें बड़े बड़े बहुमूल्य मोती और अनेक रत्न थे, परन्तु उसमें राम नाम न होने से हनुमान जी उससे संतुष्ट न हुए।‌तब उन्होंने अपने ललाट पर लगा हुआ सौभाग्य द्रव्य सिन्दूर प्रदान किया और कहा ” इससे बढ़कर मेरे पास अधिक महत्व की कोई वस्तु नहीं है” अतएव तुम इसे हर्ष के साथ धारण करो और सदैव अमर अजर रहो।यही कारण है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जन्म महोत्सव मनाया जाता है और हनुमान जी को तेल व सिन्दूर चढ़ाया जाता है।

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