हर तरफ राख है……. रूस यूक्रेन और महिलाओं की भूमिका,,, एक विचार रश्मि रंजन की कलम से

कदम मेरे सशक्त है दरख़्त पर निशान है
भरने को उड़ान देख परवाज़ भी सख्त है।

तान ली कमान तो विस्मय जगत हो रहा
पूछ लो इतिहास से हम आजमाते तख्त है।।

रसिया-युक्रेन युद्ध के बाद आज विश्व की जो स्थिति है उस पर एक टिप्पणी करते एकदम से एक गृहस्थी की कल्पना बरबस ही आ जाती हैं, और उस पर बात करे अगर भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए साझा परिवारवाद के सिद्धांत पर खड़ा उतरना।
हम भारतीय महिलाएं हर रिश्ते की परिपाटी पर खड़ा उतरने में सक्षम पाई गई है। अब आप सोचेंगे “अपने मुंह मियां मिट्ठू”।
विषय से थोड़ा हटकर नहीं लगती ये बातें पर इसके पीछे के कारण पर विचार करना जरूरी है। विचार करना इसलिए क्योंकि सामाजिक व्यवस्था को जब इतने सुचारू रूप से चला सकते है तो राजनीतिक व्यवस्था क्यों नहीं।
आपको नहीं लगता कि रसिया और युक्रेन के प्रधान या देश को चलाने वाले नायक अगर महिलाएं होती तो परिस्थिति कुछ और ही होती।
पूरी दुनिया का इतिहास वीरांगनाओं के किस्सों से भरा पड़ा है और ये महिलाएं हर उस परिस्थिती में बाहर निकली और सड़कों पर आईं जब उनसे कहा गया कि तुम घर बैठो।
युक्रेन में महिलाओं का बंदूक उठाना नारी सशक्तिकरण का एक हिस्सा मात्र है पहले और दूसरे विश्व युद्ध में महिलाओं ने नर्स, ड्राइवर्स, युद्ध से जुड़े दफ्तरों में अलग अलग भूमिकाओं में काम कर चुकी है और युद्ध के विनाशकारी परिणाम की गवाह बन चुकी है।
एक बात जो मुझे पता चली, पढ़ कर ऐसा लगा कि अभी भारत में ऐसी संभावना जताना अतिसयोक्ति हो जायेगी जहां आज भी बेटा और बेटी के बीच के अंतर को पाटने में समय लगेगा।
यूक्रेन दुनिया का एक ऐसा देश है, जहां महिलाओं की आबादी पुरुषों से ज्यादा है। यहां 86 पुरुषों पर 100 महिलाएं हैं। यूक्रेन की आजादी से लेकर अब तक यूक्रेन को हमेशा नारी ने अपनी शक्ति से सींचा है। दो साल पहले, जब रूस समर्थित विद्रोहियों ने आतंकवादी हमले कर रहे थे, तब भी कई आम महिलाओं ने अपने मुल्क की रक्षा के लिए हथियार उठा लिए थे। आज भी हथियार उठा रहीं इन महिलाओं में कोई अर्थशास्त्री, वकील है तो कोई कवि या पत्रकार, लेकिन अब इनका मकसद एक ही है…देश की रक्षा करना। इनमें से कोई स्नाइपर (सैन्य निशानेबाज), कोई युद्ध चिकित्सक तो कुछ पूरी तरह फौजी ही बन गईं।
यहां इस समीक्षा से हम नारी शक्ति के पूर्णता, ससक्तता, और कुछ भी करने और सहने की क्षमता पर ये वक्तव्य लिखने या पढ़ने में जितना आसान लगता है, क्या सच में इतना आसान है??
आज जब यूक्रेन के नागरिकों पर जंग की वजह से तबाही का सामना करना पर रहा है, ऐसी स्थिति में यूक्रेन की महिलाएं एक अलग ही तरह का युद्ध लड़ रही हैं। ये ऐसी जंग है, जिसमें महिलाओं को अपने परिवारों और अपने समुदायों के साथ-साथ अपनी हिफ़ाज़त की मशक़्क़त भी करनी पड़ रही है।

यहां हमने महिला सशक्तिकरण और लीडरशिप की बात की पर क्या हमारा समाज और हम इस बदलाव को स्वीकार कर पायेंगे???
सवाल तो बहुतेरे है पर जवाब…….??

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