पारंपरिक जल प्रबंधन एवं स्वदेशी ज्ञान पर अंतर्विषयी संगोष्ठी का आयोजन
नैनीताल l कुमाऊँ विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग तथा यूजीसी एमएमटीसी के संयुक्त तत्वावधान में मुख्यमंत्री “पारंपरिक जल प्रबंधन, स्वदेशी ज्ञान और सतत भविष्य” विषय पर एक दिवसीय अंतर्विषयी संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। भारत और नेपाल के हिमालयी क्षेत्र को केंद्र में रखकर आयोजित इस संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रख्यात विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया तथा हिमालयी संदर्भ में जल, संस्कृति, पारिस्थितिकी और सतत विकास के महत्वपूर्ण अंतर्संबंधों पर गहन विचार-विमर्श किया।
उद्घाटन सत्र में प्रो. रीतेश साह ने नौले, धारे और खाल-चाल जैसी पारंपरिक जल प्रणालियों के ऐतिहासिक एवं संरचनात्मक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये प्रणालियाँ भारत और नेपाल के मानसखंड क्षेत्र में सदियों से जन-जीवन का आधार रही हैं और इन्हें केवल जल संरचनाएँ मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि ये सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत की अमूल्य धरोहर भी हैं।
प्रो. संजय घिल्डियाल ने जल को मानव सभ्यता, संस्कृति और पहचान का मूल तत्व निरूपित करते हुए उसके दार्शनिक और ऐतिहासिक आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिपादित किया कि जल केवल जीवन का जैविक आधार नहीं, बल्कि समाजों, परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों का भी केंद्रबिंदु है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी सामूहिक अस्मिता को जीवंत बनाए रखता है।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता श्री राजेन्द्र सिंह रावल ने भारत और नेपाल के साझा हिमालयी सांस्कृतिक परिदृश्य में अंतरसीमावर्ती जल सहयोग की अनिवार्यता को रेखांकित किया। उन्होंने नहरों, स्रोतों, नौलों, धारों और गूल जैसी स्वदेशी जल प्रबंधन प्रणालियों के विकास-क्रम, उनके सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और स्थापत्य महत्व पर विस्तार से विचार रखे। श्री रावल ने आगाह किया कि जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और बदलते बसावट पैटर्न के कारण इन प्रणालियों की स्थिरता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है, इसलिए इनका व्यापक दस्तावेजीकरण अविलंब आवश्यक है। साथ ही उन्होंने साझा नदी घाटियों में सुदृढ़ नीतिगत ढाँचे, द्विपक्षीय सहयोग और बेहतर आधारभूत संरचना विकसित करने पर बल दिया।
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि, अंतर्राष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD), काठमांडू, नेपाल के डॉ. संजीव कुमार भुचर ने हिन्दू कुश हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक स्रोतों (स्प्रिंग्स) के बहुआयामी महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि पर्वतीय समाज इन स्रोतों से केवल उपयोगितावादी स्तर पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दृष्टि से भी अत्यंत गहराई से जुड़े हुए हैं। डॉ. भुचर ने पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक समझ के समन्वय की आवश्यकता पर जोर देते हुए नेपाल की ‘हिटी’ प्रणाली तथा पोखरी, देवीथान और जिंग जैसी जलागम परंपराओं के सजीव उदाहरण प्रस्तुत किए और बताया कि ये प्रणालियाँ आज भी नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र और स्थानीय आजीविका को सुरक्षित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
इतिहासकार डॉ. वसुधा पाण्डे ने उत्तराखण्ड के मानव-निर्मित परिदृश्य और प्राकृतिक जल स्रोतों पर उसकी गहरी निर्भरता के ऐतिहासिक साक्ष्यों को उद्धृत करते हुए जल और मानव जीवन के अविच्छिन्न संबंध को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। अन्य वक्ताओं ने भी हिमालयी जल प्रणालियों के ऐतिहासिक, सामाजिक और पारिस्थितिक आयामों पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किए।
संगोष्ठी का अकादमिक कार्यक्रम दो तकनीकी सत्रों में विभाजित था। प्रथम सत्र में जल प्रणालियों के पारिस्थितिक, ऐतिहासिक और पौराणिक पक्षों पर विचार-विमर्श हुआ, जिसमें पारंपरिक संरचनाओं की सहनशीलता, जल विरासत के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता तथा स्वदेशी प्रथाओं को आधुनिक नीतियों में समाहित करने पर विशेष बल दिया गया। द्वितीय सत्र में जल के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और अंतरसीमावर्ती पक्षों पर गहन चर्चा हुई, जिसमें धार्मिक नगरीकरण, औपनिवेशिक जल नीतियाँ, लैंगिक भूमिकाएँ, सामाजिक पहचान तथा भारत-नेपाल की साझा जल विरासत जैसे महत्वपूर्ण विषय केंद्र में रहे।
समापन सत्र में प्रो. ख़रात ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में सतत भविष्य सुनिश्चित करने हेतु स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और सामुदायिक प्रथाओं को गंभीरता से समझना और उन्हें मुख्यधारा की नीतियों में शामिल करना अपरिहार्य है। प्रो. पी. सी. तिवारी ने अपने दीर्घ शोध अनुभवों को साझा करते हुए जल प्रबंधन से जुड़े अंतरसीमावर्ती मुद्दों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने आँकड़ों के माध्यम से प्रमाणित किया कि शहरीकरण, अनियोजित विकास और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण पारंपरिक जल स्रोतों पर निरंतर दबाव बढ़ता जा रहा है और हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है।
प्रो. तिवारी ने हिमालयी जल प्रणालियों के संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी, जल स्रोतों के पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, सुदृढ़ जल नीति और भारत-नेपाल जैसे साझा जल क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को अनिवार्य बताया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यदि पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक तकनीक, डेटा आधारित योजना और सामुदायिक सहभागिता को एकसाथ जोड़ा जाए, तो जल प्रबंधन के क्षेत्र में व्यापक और स्थायी सुधार की संभावनाएँ प्रचुर हैं। उन्होंने नौलों, धारों, गूलों और अन्य स्थानीय जल प्रणालियों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, युवाओं की सक्रिय भागीदारी और शोध आधारित नीति निर्माण पर विशेष बल दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इनकी संरचना, उपयोगिता और सांस्कृतिक महत्व सुरक्षित रखा जा सके।
संगोष्ठी इस सर्वसम्मत निष्कर्ष के साथ सम्पन्न हुई कि पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियाँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पारिस्थितिक चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने वाले जीवंत ढाँचे हैं।
इस अवसर पर सपना महर तथा डॉ. किरण तिवारी को सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतिकरण का प्रमाणपत्र दिया गया।
आयोजक सचिव प्रो. रीतेश साह ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा संकाय सदस्यों के सहयोग के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। इस संगोष्ठी में कुलसचिव डॉ. एम एस मंद्रवाल, प्रो. सावित्री कैरा जन्तवाल, प्रो. संजय टम्टा, प्रो. अनिता पांडे, डॉ. किरण तिवारी, डॉ. सुनील पंत, डॉ. मनोज बाफिला, डॉ. संदीप बड़ौनी, डॉ. दीपक मेलकानी, डॉ वीरेन्द्र, डॉ शिवराज सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन अनन्या जोशी द्वारा किया गया।












