यादों के झरोखों से -बहुत याद आते हैं कन्नू दा।कन्नू ‌दा के बहाने।संकलन व छायांकन बृजमोहन जोशी।

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पूस के पहले रविवार को, वसंत पंचमी को , शिव रात्रि को, तथा उसके बाद शहर में जगह-जगह व दम्पत्ति टीके कि होली कि बैठकों में नित नए – नए रूप में ,नए- नए रंग में, नए -नए जोश में नजर आते थे कन्नू ‌दा। सुप्रसिद्ध होली गायक व संस्कृतिकर्मी दिनेश चंद्र जोशी कन्नू ‌दा का जन्म 10 अक्टूबर 1940 को काशीपुर में हुआ था।
तल्लीताल नैनीताल में नव ज्योति क्लब में आपने भारतीय शास्त्रीय संगीत, होली गायन -वादन की शिक्षा कई वर्षों तक दी और संगीत प्रेमियों के लिए एक ऐसा माहौल बना दिया जिसमें विद्यार्थियों के साथ साथ श्रोताओं ने भी भरपूर आनंद प्राप्त किया।
कुमाऊंनी राम लीलाओं में कैकेई व सूर्पनखा के उनके अभिनय को लोग आज भी याद करते हैं।
कितनी उर्जा से भरे होते थे वो होली के दिनों में कह नहीं सकता,आप सभी होल्यार भी मेरी इस बात के साक्षी हैं आप सबने भी उन्हें उस रुप में देखा है। वर्ष 2011मे वो बहुत बीमार थे। मैं खबर करने घर पर गया था शहर में होली कि धूम मची थी। बातों-बातों में उनके परम मित्र रमेश चंद्र जोशी जी का जिक्र संयोग वश चल पढ़ा न जाने कितनी देर तक बातें चली, दूसरे दिन नैनीताल समाचार में होली थी मुझसे कहा बिरजू कल कोशिश करूंगा एक चक्कर आ जाना तुम्हारे साथ आना जाना हो जायेगा। उनके घर से नैनीताल समाचार के प्रांगण कि दूरी लगभग 300-400 मीटर होगी। मुझे उन्हें कैंट उनके घर से नैनीताल समाचार के प्रांगण तक लाने में 1 घण्टे का समय लगा था इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि उनका स्वास्थ्य क्या रहा होगा। के.के.साह जी ने उन्हें देखते ही कहा यस हालत में किलै आछा हो दाज्यू। चलो भल करौ जो ऐ गो छा। शकुन कर जाला।
लोगों ने उनसे आग्रह किया होली गायन के लिए पहले तो मना कर दिया फिर सबका मान रखने के लिए जैसे तैसे उठे। जब होली गायन के लिए बैठे तो फिर कन्नू ‌दा ही कन्नू ‌दा थे,वहीं स्वर, वहीं फूर्ति, वहीं लटकें -झटके कौन कहेगा कि यह एक बीमार व्यक्ति है, लोगों कि वाह वाही से उनके भीतर नयी उर्जा का संचार हो रहा था। यही उर्जा, यही फूर्ति मैंने गिरीश तिवारी गिर्दा के भीतर भी देखी थी जब वो बहुत बीमार थे। मेरा यह भी मानना है कि यही वो उर्जा थी इन महान आत्माओं के भीतर जिसके बल पर यह एक लम्बे समय तक मौत से लड़ते रहे। इनसे बात करते समय लगता ही नहीं था कि यह व्यक्ति इतना बीमार हैं।‌ लोक विधाओं का यह फनकार 1 अगस्त 2011को अनन्त में विलीन हो गया।
आज होली कि उन तमाम पुरानी रिकार्डिंग जो के.के.साह जी आवास पर रिकॉर्ड कि थी उन्हें सुनकर ही कन्नू ‌दा, के.के.साह , विश्वंभर नाथ साह सखा दाज्यू , अनूप दा, वाचस्पति ड्योढ़ी , विनोद कुमार (तबला वादक) गुरु जी रमेश चंद्र जोशी जी आदि होल्यारों को याद कर लेता हूं।
होली के बहाने ही सही ये होल्यार सदा हमारी यादों में जिन्दा रहेंगे।
वरिष्ठ होल्यार स्व.दिनेश चन्द्र जोशी ( कन्नू ‌दा ) के बहाने इन्हें सादर नमन।
क्या ज़िन्दगी का ठिकाना
फिरत मन क्यों रे भुलाना…….?

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