हर तरफ राख है………रूस यूक्रेन लड़ाई का दंश झेल रही बेकसूर महिलाओं की दर्दनाक कहानी रश्मि रंजन की कलम से

सड़न की बू से बदन, दफ़न करने की ख्वाहिश
पर तेरे वजूद को आजमाने से बाज आती नहीं।
विपरीत परिस्थिति, अभाव में छीनने की होड़ है
उम्मीदें मेरी जिंदगी तुझे देने का हक मांगती रही।।
जब एक ओर जिंदगी छीनने की होड़ लगी हो और दूसरी ओर जिंदगी देने की तो जीत तो जिंदगी देने वाले को ही मिलती है। लेकिन ऐसी विषम परिस्थितियों में सुविधाओं के अभाव में किसी एक को समझौता कर लेना पड़ता है।
यूक्रेन में पारंपरिक रूप से पुरुषवादी समाज होने और लैंगिक असमानता के नियमों और सोच के चलते यूक्रेन की महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं और न्याय सेवा तक पहुंच पहले ही हासिल नहीं थी। अब इस युद्ध के चलते महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह तलाश पाना और भी मुश्किल हो गया है।
प्रेगनेंसी के कई किस्से सामने आए। भारत की नीतू का किस्सा भी मैंने आपके सामने रखा था और उनकी तकलीफों को उनके ही शब्दों में रखने की कोशिश की थी। नीतू अकेली महिला नहीं थी जिन्होंने यह सब झेला।
एक अनुमान के अनुसार कि यूक्रेन में लगभग 80 हज़ार महिलाओं की डिलीवरी होनी थी।
इस अंश में ऐसे ही कुछ किस्से आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूं।
एक गर्भवती महिला की स्ट्रेचर पर अपना फूला हुआ पेट पकड़े-पकड़े मौत हो जाने की घटना सुनने में आई थी। ऐसे में उन स्त्रियों की परेशानियां उजागर हुई, जिन्हें प्रसव से पहले बहुत देख-रेख की ज़रूरत होती थी और मिलती थी पर युद्ध के माहौल सुविधाओं की कमी की वजह से वो सुविधा नहीं मिल सकी और नतीजतन मृत्यु।
एक एसोसिएट प्रेस से एक केस स्टडी की जानकारी मिली थी कि यूक्रेन के मारियुपोल शहर के एक अस्पताल के तहखाने में एक अस्थायी प्रसूति वार्ड में महिला ने बच्चे को जन्म दिया जबकि इस अस्पताल का ही एक भाग बंकर में तब्दील किया गया था। ऑपरेशन गंगा मिशन की बदौलत संगठन बॉर्डर पहुंचे अभिजीत और नीतू की कहानी आपसे साझा की थी कि नीतू की प्रेगनेंसी के दौरान किन मुसीबतों से गुजरे, वे कहते है मैं इनका कितना शुक्रगुज़ार हूं ये बताने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं। इस ज़िंदगी में मैं राजेश और अंजना को कभी नहीं भूल पाउंगा।” उन्होंने अपने पैदा होनेवाले बच्चे का नाम अभी से तय कर लिया है। नीतू बताती हैं, “हम उसे गंगा बुलाएंगे।”
गोलीबारी और बमबारी के चलते, महिलाओं द्वारा अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशनों पर बच्चे पैदा करने और नवजात बच्चों को हड़बड़ी में अस्थायी तौर पर बनाए गए बम से बचने के ठिकानों में ले जाने की तस्वीरें पहले ही सोशल मीडिया पर देखी जा रही हैं।
युद्ध के कारण देश की नियमित स्वास्थ्य सेवाएं बहुत सीमित हो गई जिसके कारण महिलाओं के लिए स्वास्थ्य की बुनियादी सेवाएं और ख़ास तौर से प्रजनन और यौन संबंधी रख-रखाव हासिल कर पाना और भी मुश्किल हो गया है। इस विवेचना के बाद यही कह सकते है कि युद्ध जारी रहता है तो मां की सेहत के बेहद अहम स्वास्थ्य सेवाएं सीमित रहती हैं, तो बच्चे पैदा करने का तजुर्बा इन महिलाओं के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है।
इतने दिनों बाद भी जब कुछ नज़र नहीं आता नज़र आती है बेबसी, नाउम्मीदी और निराशा…… निष्कर्ष…… बस हर तरफ राख है………








