हर तरफ राख है…. युद्ध की आग में तपती युक्रेनी महिलाओं की दर्दनाक हालात रश्मि रंजन की कलम से

औरत ही औरत की दुश्मन, भाव कैसे ये कह जाए
कहावत चरितार्थ हुई जो बचपन से सुनती आई।
खींचा-तानी चल रही अस्तित्व बचाने की होड़ मची
विवशता की डोर में खुद को ही तुम बांधती आई।।
ब्रिटेन के एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के माध्यम से यह जानकारी सामने आई कि रूसी सैनिकों की हैवानियत के चलते कंडोम की सेल 170 फीसदी बढ़ गई है।
रूस और यूक्रेन युद्ध के बीच से दुनियाभर की आर्थिक गतिविधियों पर थोड़ा-बहुत असर देखने को मिला है और इस हैरत में डाल देने वाली कंडोम की बढ़ती मांग।
आज यह सोच रहे होंगे आप कि कहां अब तक नारी विषयक भावनाओं, युद्ध के कारण उनके जीवन के प्रभावों, उतार-चढ़ाव की चर्चाओं के बीच कंडोम की बात कहां से आ गई। मगर इस सत्य से मुकरा तो नही जा सकता। मीडिया प्लेटफार्म की माध्यम से ही मिली जानकारी से कुछ तथ्य साझा करूंगी तो आप अनुमान लगा सकते है कि महिलाओं के जीवन के आपा-धापी के बीच कंडोम का जिक्र ऐसे ही नहीं हुआ,
लेकिन इसी बीच कुछ मीडिया प्लेटफार्म के द्वारा कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आए जिसे पढ़ कर मुझे एकदम से एक लोकोक्ति याद आ गई “औरत ही औरत की दुश्मन होती है”। हमारे भारतीय समाज में यह काफी प्रचलित है।
रूस-युक्रेन युद्ध की विभीषिका में न सिर्फ आम नागरिकों के हत्याओं की खबरें आई बल्कि महिलाओं और नाबालिग युवतियों के साथ रेप के मामले भी सामने आए हैं।
युक्रेन की सीक्रेट सर्विस एजेंसी के तरफ से एक ऑडियो जारी किया गया जिसमें कथित तौर पर रूसी सैनिक की पत्नी अपने पति से यूक्रेनी महिलाओं के साथ बलात्कार की बात कह रही है।
RFE/RL की जांच में इसकी सत्यता की पुष्टि भी की गई। यह घटना अप्रैल के शुरुआत बताई जाती है।
इस ऑडियो में एक महिला की आवाज है, जिसे कॉल पर दूसरी तरफ एक पुरुष को ‘यूक्रेनी महिलाओं से बलात्कार करने की अनुमति’ देते हुए सुना जा सकता है। महिला हंसते हुए कहती
है, “हां, मैं अनुमति देती हूं। बस प्रिकॉशन ले लेना।”
ऑडियो में महिला को कहते हुए सुना जा सकता है, “तो हां, इसे वहीं करो… वहां यूक्रेन की महिलाऐं हैं, उनके साथ बलात्कार करो।” वे हंसते हुए कहती है, “मुझे कुछ मत कहो, समझे।” महिला हंसते हुए आगे कहती है, “हां, मैं अनुमति देती हूं। बस प्रोटेक्शन ले लेना।”
RFE/RL की रूसी सेवा और Skhemy के रिपोर्टर, एक जॉइंट सर्च प्रोजेक्ट ने यूक्रेन की
सुरक्षा सेवाओं के स्रोतों टेलीफोन नंबर हासिल किए। इसके बाद उन्होंने इन फोन नंबरों
के जरिए सोशल मीडिया अकाउंट ढूंढे। इसमें पता चला कि यह ब्यकोवस्की और उनकी पत्नी के हैं।
यह घटना अंतरात्मा को झकझोर कर रख देती है। ये एक कॉल रिकॉर्ड सामने आए थे। किसको पता और कितने ऐसे केस होंगे जिनके सत्यता के प्रमाण शब्दों के आदान प्रदान का हिस्सा मात्र बन कर रह गए हैं।
नारी सशक्तिकरण की बात करते है, पर ऐसी महिलाएं जब समाज का हिस्सा है तो दूसरी नारी को शक्ति देने की बात पर सहमति कैसे बने??
जब एक स्त्री हो कर हम नारी विषयक भावनाओं को आहत पहुंचाते है विशेष कर बात जब उनकी अस्मिता की हो तो कहीं न कहीं यह पंक्तियां सार्थक लगती है, बस हर तरफ राख है……..








