हर तरफ राख है……युक्रेन- रूस युद्ध

दर-बदर है जिंदगी चुभते बहोत कील भी
समेटने की ख़्वाहिशों में टूटता वजूद है

रोक दो विध्वंस को मानवता बोझिल हुई
कैसे चुका पाओगे तुम चढ़ रहा सूद है।

54वां दिन।।।
वही सवाल, वही परिस्थिति, वही बिलखता अस्तित्व।
शायद मैं उस स्थान पर नहीं हूं इसलिए इस विषय का चित्रण उतना मार्मिक और सटीक नहीं हो पाए। इस परिस्थिति को किस तरह से महसूस किया जाए यह भी तय करना मुश्किल हो रहा। दर्द, तकलीफ, आहें, पीड़ा, बिछोह, मृत्यु, बिखरे हुए छत-विछित देह कितने भी परिभाषित शब्दों का इस्तेमाल कर लिया जाए परिस्थिति विशेष का सही मूल्यांकन करना फिर भी कठिन होगा।
मैं एक महिला होने के नाते खुद को बहुत ससक्त मानती हूँ। भगवान ने हर परिस्थिति, हर कष्ट को झेलने की क्षमता मुझे दी है। किसी भी स्थिति में अपना परिवार संभालना, प्रसव पीड़ा को झेलना,
मासिक के दर्द का अनुभव – सब कर सकती हूँ।
पर इन्हीं सब स्तिथियों का अनुभव और एक विशेष परिवेश – युद्ध।
खुद उस जगह पर रह कर उस परिस्थिति को नाप नहीं सकती पर जब मैं एक स्त्री की तरह सोचूँ तो मैं अपनेआप को इससे अछूता नहीं पाती ।

न्यूज़ पेपर, डिजिटल मीडिया आदि का सही में तहे दिल से आभार।
इन सभी माध्यमों से परिस्थिति विशेष पर एक महिला होने के नाते अपनी पक्ष रखने की कोशिश जारी रहेगी।
आगे कुछ छोटे छोटे कहानियों, पर असल में इसे कहानी तो बोल नहीं सकते क्योंकि अगर मैं खुद को पूर्ण मानती हूँ तो यह मेरी या आपके जीवन का अनुभव तो हो ही सकता हैं।

रश्मि रंजन

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