597 वे वेबिनार में स्वामी श्रद्धानंद पर गोष्ठी संपन्नत्याग बलिदान के पर्याय थे श्रद्धानंद-आचार्य हरिओम शास्त्री

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नैनीताल l केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्वावधान में “स्वामी श्रद्धानंद व्यक्तित्व व कृतित्व “पर ऑनलाइन
गोष्ठी आयोजित की गई I य़ह करोना काल से 597 वाँ वेबिनार था I

वैदिक विद्वान आचार्य हरिओम शास्त्री ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद जी का व्यक्तित्व निराला था एक बार में ही किसी को अपना बना लेता था I उन्होंने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती श्रद्धा और विश्वास तथा समर्पण की साक्षात् प्रतिमा थे। ऋषि दयानन्द जी से मिलने के बाद शनै: शनै: एडवोकेट मुंशीराम जी धीरे धीरे महात्मा मुंशीराम और फिर स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती के व्यक्तित्व के रूप में परिवर्तित होते गए। स्वामी दयानन्द जी के सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास से प्रेरणा लेकर लाला मुंशीराम जी ने गुरुकुल आन्दोलन का सूत्रपात किया और सम्पूर्ण भारत में गुरुकुलों का जाल बिछा दिया। बिजनौर के जमींदार मुंशी अमनसिंह जी द्वारा दान में दिये गये सम्पूर्ण कांगड़ी गांव की 700 बीघे जमीन पर गुरुकुल खोलकर देश में शिक्षा का नया सूत्रपात किया।वे केवल शिक्षा क्षेत्र में ही नये प्रयोग के समर्थक नहीं थे बल्कि राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी नया नया प्रयोग करते रहे। दिसंबर 1922 के गुरु के बाग वाले आन्दोलन में भी अपने आशीर्वाद देने अमृतसर पहुंचे थे। हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने हेतु जामा मस्जिद और फतेहपुरी मस्जिद के मिंबर पर जाकर मुसलमानों को देश के लिए अपने बलिदान देने की शिक्षा दी। जलियांवाला बाग कांड के बाद अमृतसर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन करने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं था।उस समय की चुनौती को स्वीकार करके स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी ने उस प्राकृतिक और राजनैतिक विषम परिस्थिति में भी कांग्रेस का अखिल भारतीय अधिवेशन सफलता पूर्वक सम्पन्न कराया था। मुस्लिमों की शुद्धि आन्दोलन को लेकर कांग्रेस कमेटी से उनका मतभेद हो जाने पर उन्होंने कांग्रेस कमेटी से तुरंत ही त्यागपत्र दे दिया और बड़े ही जोर शोर से मुस्लिम बने मलकाने राजपूतों की शुद्धि का कार्य चलाया जिससे मुस्लिमों में नाराजगी फैल गई।कई मुस्लिम नेताओं ने उन्हें इस कार्यक्रम को रोकने को कहा परन्तु स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी ने उन्हें हिन्दुओं को मुसलमान बनाने को रोकने को कहा। साथ ही उनके रुकने पर ही शुद्धि आन्दोलन रोकने की बात कही।इस बात को मुसलमान नेता नहीं माने तो स्वामी जी ने भी उनकी बात नहीं मानी। इसी टकराव के परिणामस्वरूप अब्दुल रशीद नामक मदांध मुस्लिम युवक ने 23 दिसंबर 1926 ई. को स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी को गोलियों से शहीद कर दिया।
श्रद्धा और आनन्द की इक खान श्रद्धानन्द थे।
धर्म पर जो हो गये बलिदान श्रद्धानन्द थे।।
इन अमर आर्य बलिदानी स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी को शत शत नमन है I

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मुख्य अतिथि आर्य नेता सुरेंद्र बुद्धिराजा व अध्यक्ष सुधीर बंसल ने भी स्वामी जी के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया I राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया I

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गायिका प्रवीना ठक्कर, रविन्द्र गुप्ता,ईश्वर देवी,उषा सूद, जनक अरोड़ा,राज श्री यादव,चन्द्रकांता गेरा,नरेश खन्ना आदि के सुन्दर भजन हुए I

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