तिब्बती नव वर्ष लोसर 18 फरवरी से 20 फरवरी 2026 तक मनाया गया। यह साल तिब्बती राजा वर्ष 2153 है जिसका तत्व अग्नि और प्रतीक चिन्ह घोड़ा है और लिंग स्त्री है। यह वर्ष तिब्बती कैलेंडर के हिसाब से अग्नि स्त्री घोड़ा तिब्बती राजा वर्ष 2153 का हैं लोसर के पहला दिन प्रातः सभी पूरे परिवार के साथ सब से पहले अपने घर के मंदिर में एकृत होकर बारी बारी सभी भगवान और देवी देवताओं और अपने पूज्य लामाओ को नववर्ष की हार्दिक बधाई चुटकी भर सत्तू के भोग हवा में उछालकर और मंदिर पर खातक चढ़ाते हुए ही अपने मनोकामनाएं पूर्ण होने की आशीर्वाद भी मांगते है। सभी सदस्य एक दूसरे को लोसर की बधाई देते हैं। पारंपरिक नाश्ते में तिब्बती मक्खन वाली नमकीन चाय और मीठा चावल “ड्रेसिल” खाते है और पारंपरिक तौर पर थोड़ा थोड़ा उबला हुआ चांग का सूप पीते है। पहला दिन सिर्फ रिश्तेदारों के घर बधाई देने जाते है और बौद्ध मठ में दर्शन और लामाओ को बधाई देने जाते है। लोसर के दूसरे दिन से ही दूसरों के घर बधाई देने जाने का और मेहमानों की मेज़बानी करने रिवाज़ होता है। तीसरे दिन शुक्रवार को सुख निवास स्थित बोध मठ में तिब्बती और भोटिया समुदाय के लोगों ने विश्व शांति, नगर की उन्नती, शांति, खुशी और भाईचारा के लिए सामूहिक पूजा किया। पूजा में परम पूज्य दलाई लामा जी की दीर्घायु, मंगल स्वस्थ और मंगलकामनाएं पूर्ण होने के लिए प्रार्थना भी किया गया। पारंपरिक तौर पर मठ के आगे लगे हुए बड़ा ध्वज को भी बदला गया। लोसर के शुभ अवसर पर तिब्बती और भोटिया मार्केट तीन दिन के लिए पूर्ण रूप से बन्द रहेग। दुकानें शनिवार यानी 21 फरवरी को खुलेगी। सामूहिक पूजा की अध्यक्षता बौद्ध मठ के मुख्य पुजारी गेशे लोबसांग यांगफेल द्वारा किया गया। सामूहिक पूजा में स्थानीय तिब्बती समुदाय के वरिष्ठ सदस्य तुल्कु लांगदोंग रिनपोछे, तिब्बती मार्केट एसोसिएशन के अध्यक्ष येशी थुप्तेन, तिब्बती संघर्ष समिति के सचिव तेनजिन धोनयोए, तेनजिन छिरींग, स्थानीय तिब्बती युवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष टाशी तोपग्याल, कुंगा छौडोन, स्थानीय तिब्बती महिला संगठन के अध्यक्ष केलसंग छूकी, सचिव रिंजिन छोएजोम, ल्हाकपा गयालपो, पेमा छोमफेल, छिरींग तोपग्याल, रिंचेन नमगयाल, निर्मल सिंह भोटिया, पान सिंह भोटिया, तेनजिन गादेन, तेनजिन यिगा, छिरींग पेलकी, तेनजिन नॉर्जोम, केलसंग वांगमो, केलसंग यांगडोन, छिरींग डोल्मा, टाशी डोल्मा, गुंडुली, निर्मला देवी, डोल्मा खिमाल और पासंग खिमाल आदि मौजूद रहे ।