युवा दिवस पर विशेष

भारतीय संस्कृति के ध्वज वाहक ,युवाओं की शक्ति के पुंज ,राष्ट्र की भावना जागृत करने वाले महान आध्यात्मिक नेता, विचारक और समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद का जन्म दिन 12 जनवरी ही युवा दिवस है ।
युवा दिवस 2026 थीम “उठो, जागो और अपनी शक्ति को पहचानो” रखी गई है जो समाज में युवाओं के योगदान के साथ युवाओं को दृढ़ रहने और जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करता है जिसमें
आत्म-विश्वास, निस्वार्थ सेवा (दरिद्रनारायण की सेवा), एकता, शिक्षा ,चरित्र निर्माण और आत्मनिर्भरता के साथ वेदांत दर्शन का व्यावहारिक अनुप्रयोग मिलता हैं ।धर्मों में एकता और सार्वभौमिक भाईचारे पर बल देता है तथा शारीरिक और मानसिक शक्ति के विकास को प्रेरित करता है ।
स्वामी विवेकानंद का मानना था कि हर व्यक्ति के भीतर अनंत शक्ति है हमें इसे जगाना है। उनका प्रसिद्ध मंत्र है, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”. इसे प्रतिपादित करता है ।
विवेकानंद जी ने धर्मों के मूल सिद्धांतों में एकता पर जोर दिया, और सभी जीवों में एक ही आत्मा के दर्शन पर बल दिया.
तथा कहा कि शिक्षा जो चरित्र निर्माण करे, आत्मविश्वास दे, और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए, न कि केवल किताबी ज्ञान दे।
उन्होंने युवाओं से “लोहे की मांसपेशियों और फौलादी नसों” के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति के विकास का आह्वान किया, जिसके लिए वे फुटबॉल खेलने और गीता के अध्ययन को महत्वपूर्ण मानते थे।
उन्होंने वेदांत के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में उतारने पर जोर दिया, जिसमें सभी में ईश्वर का वास देखना शामिल है. ।निस्वार्थता, प्रेम और त्याग को नैतिकता का आधार बताया, और व्यक्तिवाद के बजाय परमार्थ पर जोर दिया.
विवेकानंद का दर्शन युवाओं को आत्म-निर्भर, चरित्रवान, समाज-सेवी और आध्यात्मिक रूप से जागृत बनाता है जिससे भारत और विश्व में एकता और समानता आए।.
स्वामी विवेकानंद का जन्म: 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ उनका वास्तविक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था , जिन्होंने वेदांत और योग दर्शन को विश्व में फैलाया, विशेषकर 1893 के शिकागो धर्म सम्मेलन में अपने ऐतिहासिक भाषण से भारत की आध्यात्मिक पहचान स्थापित की। उन्होंने रामकृष्ण मिशन और मठ की स्थापना की, और युवाओं को प्रेरणा देने, शिक्षा व राष्ट्रवाद को आध्यात्म से जोड़ने का काम किया।
‘विवेकानंद’ जिस शब्द का अर्थ संस्कृत में ‘विवेक’ = ज्ञान, ‘आनंद’ = परमानंद) है तथा उनके
गुरु रामकृष्ण परमहंस थे।
विवेकानंद ने शिक्षा, राष्ट्रवाद, मानवतावाद और जातिवाद पर क्रांतिकारी विचार रखे और कहा कि शिक्षा को चरित्र निर्माण और अच्छे इंसान बनाने का माध्यम माना जाना चाहिए ।
विवेकानंद भारतीय संस्कृति, वेदांत, उपनिषदों और गीता से प्रभावित थे और पश्चिमी विज्ञान और भारतीय आध्यात्म का समन्वय चाहा। विवेकानंद
भारतीय युवाओं के लिए आदर्श है ।’एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने का मार्ग प्रशस्त किया ।
विवेकानंद के प्रेरक विचार में
“एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो।”
शिक्षा केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है।
किंतु विवेकानंद ने 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में महासमाधि ली ।
स्वामी विवेकानंद के विचार और कार्य आज भी करोड़ों युवाओं और समाज सुधारकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, जो उन्हें भारत के एक सच्चे मार्ग निर्माता के रूप में देखते हैं। बचपन से मेधावी तथा कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से बीए की डिग्री लेने के बाद उन्होंने दर्शनशास्त्र व भारतीय ग्रंथों का गहरा अध्ययन किया, लेकिन उनका जीवन तब बदला जब वे रामकृष्ण परमहंस से मिले, जो उनके आध्यात्मिक गुरु बने। रामकृष्ण परमहंस से प्रेरणा लेकर और 25 साल की उम्र में सांसारिक जीवन त्यागकर, उन्होंने रामकृष्ण मठ की स्थापना की और भारत के प्रतिनिधि के रूप में शिकागो धर्म संसद में वेदांत का संदेश फैलाया, जिससे वे एक आध्यात्मिक गुरु और विश्व बंधुत्व के प्रतीक बने।
उनकी संगीत, खेलकूद और कुश्ती में भी रुचि थी।
ईश्वर को पाने की तीव्र इच्छा और जीवन के गूढ़ सवालों के जवाब ढूंढते हुए वे रामकृष्ण परमहंस से लगभग 1881 मे मिले तब
रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें बताया कि वे ईश्वर को देख सकते हैं, जिससे नरेंद्रनाथ बहुत प्रभावित हुए। तथा
रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में, नरेंद्रनाथ ने सांसारिक जीवन त्याग दिया और संन्यासी बन गए।
‘विवेकानंद’ नाम उन्हें खेतड़ी के राजा अजीत सिंह शेखावत ने दिया था, जब वे अमेरिका यात्रा पर जा रहे थे
1893 में शिकागो विश्व धर्म संसद में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया और वेदांत दर्शन का संदेश दुनिया को दिया, जिससे वे विश्व-प्रसिद्ध हो गए।
इस तरह, एक मेधावी छात्र से, गहन आध्यात्मिक खोज और रामकृष्ण परमहंस के मार्गदर्शन से, वे एक विश्वव्यापी आध्यात्मिक गुरु ‘स्वामी विवेकानंद’ के रूप में उभरे
, जो मानव सेवा को ईश्वर सेवा के साथ अद्वैत वेदांत (सभी में एक ही आत्मा का विश्वास) और व्यावहारिक आध्यात्मिकता को मानते थे जिन्होंने शिक्षा, सामाजिक समानता, कमजोरों के उत्थान और भारतीय संस्कृति के पश्चिमी विज्ञान के साथ समन्वय के माध्यम से व्यक्ति और राष्ट्र के उत्थान पर लोगों को केंद्रित किया ।
सभी आत्माएं एक हैं, और ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग स्वयं को जानना है। यह दर्शन सभी के लिए ज्ञान और मुक्ति के विचार को बढ़ावा देता है।
मानव सेवा ही ईश्वर सेवा अर्थात गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करना ही सच्ची ईश्वर भक्ति है जो यह रामकृष्ण मिशन का मूल सिद्धांत है।
आत्म-विश्वास और आत्मनिर्भरता ,
‘सर्वधर्म समभाव’ और विविधता में एकता ही भारत की शक्ति है।
विवेकानंद ने कहा शिक्षा ऐसी हो जो शरीर, मन और आत्मा को मजबूत बनाए और समाज सेवा की भावना विकसित करे, तथा उसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास शामिल हो ।उन्होंने सामाजिक समानता, स्त्री-पुरुष न्याय और भेदभाव मुक्त समाज की वकालत की, जो आधुनिक भारत के लिए आवश्यक है।
विवेकानंद कहते है
“तुम वही हो जो तुम्हारे विचार तुम्हें बनाते हैं”
“सबसे बड़ा पाप है अपने आप को कमजोर समझना” – आंतरिक शक्ति पर जोर।
“जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आए, आप निश्चिंत हो सकते हैं कि आप गलत रास्ते पर चल रहे हैं” – चुनौतियों को स्वीकारना।
विवेकानंद का दर्शन भारतीय आध्यात्मिकता को आधुनिकता और व्यावहारिकता के साथ जोड़ता है, जो हर व्यक्ति के भीतर छिपी अनंत क्षमता को जगाकर राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। स्वामी विवेकानंद जी को नमन है l doctor Lalit Tiwari









