कुमाऊं विश्वविद्यालय में हिमालयी मत्स्य पालन पर कार्यशाला आयोजित

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के प्राणी विज्ञान विभाग द्वारा एमएमयूएसएसपीवाई के अंतर्गत रीसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (रास) विषय पर एक दिवसीय जागरूकता कार्यशाला का आयोजन डीएसबी परिसर में किया गया। कार्यशाला में हिमालयी क्षेत्र में मत्स्य पालन की संभावनाओं, विशेषकर स्नो ट्राउट के संरक्षण एवं उत्पादन पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में डीसीएफआरआई (आईसीएआर), भीमताल के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. सुरेश चन्द्र ने प्रतिभाग किया। उन्होंने बताया कि स्नो ट्राउट हिमालय की मूल प्रजाति है, किन्तु इसकी व्यावसायिक क्षमता अभी सीमित है। इसके विपरीत, रेनबो ट्राउट एक बाहरी प्रजाति होते हुए भी व्यावसायिक दृष्टि से अधिक लाभकारी सिद्ध हो रही है। साथ ही ग्रास कार्प, कॉमन कार्प एवं महाशीर जैसी स्थानीय प्रजातियों के पहाड़ी एवं तराई क्षेत्रों में पालन की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया। उन्होंने तराई में कैटफिश के तीव्र विकास के कारण इसके व्यावसायिक पालन को लाभकारी बताया।
उन्होने यह भी उल्लेख किया कि विश्व स्तर पर मत्स्य उत्पादन में भारत चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, जिससे इस क्षेत्र में व्यापक संभावनाएं परिलक्षित होती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट ने की तथा उन्होंने अपने संबोधन में विभाग की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला। निदेशक प्रो. नीता बोरा शर्मा ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए इस प्रकार के कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यशाला के संयोजक प्रो. आशीष तिवारी रहे।
इस अवसर पर हिमालयी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों, विशेषकर बायोफ्लॉक तकनीक, का प्रदर्शन भी छात्रों को कराया गया।
कार्यक्रम में प्रो. ललित तिवारी, प्रो. हरिप्रिया, प्रो. रीना, डॉ. हिमांशु, डॉ. दीपक, डॉ सीता देवली, डॉ. संदीप एवं डॉ. लज्जा भट्ट सहित अन्य शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे।