दिनांक- १९ मार्च २०२६ से वासंतिक चैत्र नवरात्र शुरू
आलेख –
बृजमोहन जोशी, नैनीताल।
या देवी सर्वभूतेषु…..
मां दुर्गा की नौ दिन की उपासना का मर्म भी यही है कि परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हो शक्ति न्याय की ही पक्षधर होती है। विपरीत परिस्थितियों से हार न मानकर स्वयं को सकारात्मकता को इतना समर्थ बनाया जाए, जिससे जीवन मे अनुकूलता का उजाला आ सके। अतः न्याय के प्रतीक श्री राम शक्ति को अपने पक्ष में करने में सफलता पा लेते हैं। आज समाज में भले ही नकारात्मकता अधिक हो, अन्याय बढ़ रहे हो, भारतीय संस्कृति में देवी के रूप में मान्य स्त्रियों के सम्मान पर प्रहार हो रहा हो, ऐसे समय में न्याय प्रतीकों को सबल और सक्रिय बनाना होगा। शक्ति साधना या शक्ति के प्रकट होने के पौराणिक सन्दर्भ ऐसे ही समय के है,जब अन्याय चरम सीमा पर था। देवताओं ने भी देवी दुर्गा से स्वयं व सृष्टि की रक्षा करने की याचना तब की,जब राक्षसों के अत्याचार असह्य हो गये थे। श्री राम ने भी शक्ति का आह्वान ऐसे ही समय में किया। तात्पर्य यह कि अन्याय पक्ष कितना भी शक्तिशाली दिखे,वह अविजित कदापि नहीं होता।उसे टक्कर देने या निर्मूल करने का उत्साह नहीं छोड़ना चाहिए। देवी को वस्तुत: जीवन जगत की सर्व सत्ता का स्वरूप ही नहीं,कारक -पालक – निवारक भी माना गया है। वहीं लक्ष्मी रुपा है तो सरस्वती रूपा भी। शक्ति या श्रद्धा से लेकर कामना रुपों तक, प्रत्येक भाव- अनुभाव और रुपों की जाज्ज्वल्य प्रतीक। इसीलिए ‘ या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ‘ से लेकर ‘ या देवी सर्वभूतेषु कामना रुपेण संस्थिता ‘ तक के विचार को स्थापित किया गया है। त्रेता युग में यदि भगवान श्री राम द्वारा शक्ति को न्याय पक्ष में करने के लिए कठिन साधना करनी पड़ी तो आज की परिस्थितियों को भी हम सकारात्मक बना सकते हैं।यह हम पर है कि शक्ति को अपने पक्ष में करने में हम कैसी मेधा, दक्षता, क्षमता, प्रतिबद्धता और संकल्पबद्धता का प्रदर्शन कर पाते हैं। नवरात्र के नौ दिन हमें यह अवसर देते हैं कि हम अपनी सकारात्मकता से नकारात्मकता को पराजित कर सकें।
भारतीय नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा सम्वत २०८३ ” रौद्र “नाम ५४ वें सम्वत्सर की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।










