भगवत गीता में जीवन दर्शन विषय पर गोष्ठी सम्पन्न, गीता के जीवन दर्शन में है वैश्विक समस्याओं का समाधान- डॉ.रामचन्द्र (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)

बुधवार 1 अप्रैल 2026,केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्त्वावधान में ‘भगवद् गीता में जीवन दर्शन’ विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया।य़ह कोरोना काल से 775 वाँ वेबीनार था।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि भगवद्गीता भारत की सनातन ज्ञान परंपरा की अमूल्य नीधि है। इसमें वेद,उपनिषद् एवं दर्शन आदि समस्त परंपरा का व्यावहारिक एवं दार्शनिक सार केवल 700 श्लोकों में उपलब्ध है।यह विश्व का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो आकार में सबसे छोटा है पर ज्ञान की दृष्टि से सबसे महान ग्रंथ माना गया है।डॉ. राम चन्द्र ने कहा कि गीता का आरंभ अर्जुन के विषाद योग से होता है। हताश एवं निराश अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से जीवन के यथार्थ एवं स्पष्ट दृष्टि के स्वरूप को बताने के लिए प्रार्थना करता है।गीता में कहा गया है कि अपने कर्तव्य को पूरी कुशलता एवं निष्ठा से निभाना ही योग है।भिन्न-भिन्न परिस्थितियों के मध्य,सुख-दु:ख,हानि-लाभ एवं जय-पराजय के बीच समत्व की भावना को विकसित कर देना ही योग कहलाता है।गीता के अध्ययन से वर्तमान समय में बढ़ रही भारतीय समाज की एवं वैश्विक समस्याओं के निदान की भी स्पष्ट दृष्टि प्राप्त होती है।प्राणी मात्र के हित का प्रयत्न करना एवं सब जीव मात्र में अपनी ही उपस्थिति का अनुभव करके हम समाज में एक स्वस्थ वातावरण विकसित कर सकते हैं।गीता के दर्शन के अनुसार स्वस्थ एवं सात्त्विक आहार तथा यज्ञशेष का प्रयोग करके ही व्यक्ति शारीरिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर प्रसन्न रह सकता है।गीता में निष्काम कर्म एवं स्थितप्रज्ञ के जीवन दर्शन पर बहुत जोर दिया गया है।निष्काम कर्म करने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं होता। अपनी इंद्रियों के वेग को रोक कर अपने उद्देश्य में स्थिरता पूर्वक कार्य करने वाला व्यक्ति जीवन के सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर लेता है।
वर्तमान युवा पीढ़ी एवं बाल मन में तनाव एवं मन की चंचलता बढ़ रही है।मन की एकाग्रता के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।श्रीकृष्ण ने कहा है कि अभ्यास एवं वैराग्य की साधना के द्वारा मन की चंचलता को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है।जीवन में तप एवं साधना का बहुत मूल्य है। भगवद् गीता में तप के सात्त्विक, राजसिक एवं तामसिक भेद का बहुत गहरा दर्शन दिया गया है।
मुख्य वक्ता ने कहा कि गीता का जीवन दर्शन समस्त विश्व के कल्याण का स्वरूप बताता है। वर्तमान समय में विश्वभर में युद्ध की स्थितियां बढ़ रही है और मानवता त्राहि त्राहि की स्थिति में जा रही है। गीता का दर्शन हमें विश्वमानव बनाने का स्वरूप स्पष्ट करता है जिसको अपना कर हम न केवल वर्तमान की समस्याओं का ही समाधान कर सकते हैं अपितु एक बहुत ही स्वस्थ,सात्त्विक एवं श्रेष्ठ समाज का निर्माण भी कर सकते हैं।मुख्य अतिथि ओम सपरा व अध्यक्ष
जी एस त्यागी ने भी गीता की महत्ता की चर्चा की।परिषद अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया।गायिका कौशल्या अरोड़ा,जनक अरोड़ा, शोभा बत्रा, कमला हंस, संतोष धर, प्रतिभा कटारिया कुसुम भण्डारी
आदि ने मधुर भजन सुनाए।












