रूश – यूक्रेन ,, बच्चों का क्या होगा ?हर तरफ राख है….. बीबी शीर्षक से रश्मि रंजन ने रूस – यूक्रेन में महिलाओं की स्थिति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। युद्ध के परिणामों को लेकर बच्चों की मनोस्थिति समेत कई आयामों पर प्रकाश डाल रही हैं।

अभी तो उलझे सुलझे शब्दों के तार बुने थे मैंने
अभी तो आकांक्षाओं की बेल पर चढ़कर बैठा था.

अभी तो उम्मीद का कोना मुझसे मिलने आया
और बस अभी किस्तों में युद्ध मुझमें आ बैठा था।

15वें एपिसोड में हमने रूस युक्रेन युद्ध के जैसी ही कुछ परिस्थितियों की तुलना प्रथम विश्वयुद्ध से की थी तब कैसे महिलाओं की भूमिका एकदम से सक्रिय हो गई थी और पुरुषों के युद्ध में ज्यादा सक्रिय होने के कारण उनके दायित्व की वृद्धि होने लगी थी। और इस दायित्व में सबसे बड़ा योगदान समाज के रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर निकल कर महिलाओं को वोट का अधिकार प्राप्त हुआ। मनुष्यों के इस भीड़ में कोई और भी है जिसके अधिकार तो अभी दर्ज भी नहीं किए गए थे, यह पीढ़ी अभी सोचना सुनना समझना अपनी अभिव्यक्ति को व्यक्त करना सीख ही रहा था कि युद्ध के संकट में आकर घिर गया।

ऐसे ही कुछ स्थिति रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान भी देखी जा रही है, जब पुरुषों को युद्ध में शामिल होना अनिवार्य हो चुका है, तो महिलाओं के ऊपर आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियां अपने आप हावी हो गई हैं। लैंगिक परिस्थितियां बदल चुकी है। पुरुष बेरोजगार हो चुके हैं या वह भी युद्ध की आग में कूद पड़े हैं। ऐसी स्थिति में महिलाओं को घरेलू आमदनी और जीवन यापन के लिए आजीविका के साधन और नए रोजगार अपनाने पर रहे हैं।
अवैतनिक बोझ का वाह महिलाओं को करना पड़ रहा है, स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की डिमांड बढ़ गई है, पुरुषों की अनुपस्थिति और स्कूलों के बंद होने के कारण मानसिक स्वास्थ्य पर काफी गहरा पर आप प्रभाव देखा जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने बताया कि कोविड-19 के कारण जो विषम परिस्थितियां पैदा हुई थी उसके बाद ऐसा लगा था कि अब सब कुछ सामान्य होने जा रहा है और 2 वर्षों तक बच्चों की पढ़ाई पर जो प्रभाव पड़ा उसे अब गति प्रदान की जा सकेगी, परंतु सब कुछ समझते और संभालते अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था और यूक्रेन युद्ध ने परिस्थितियों को और बद से बदतर बना दिया।
इस युद्ध में सैकड़ों बच्चे मारे गए। शैक्षणिक सुविधाओं के विनाश के कारण स्कूल का सत्र बीच में ही खत्म हो गया।
हिंसक संघर्ष के बीच, यूनीसेफ़ और उसकी सहयोगी संस्थाएँ अधिक से अधिक बच्चों को सीखने के सुरक्षित एवं उपयुक्त अवसर प्रदान करने के लिये काम कर रहे हैं।
कोविड-19 महामारी जिससे उत्पन्न परिस्थितियों का
लेखा-जोखा देने में वैसे तो हमारी रूह कांप जाती है परंतु इस दौरान ऑनलाइन शिक्षा का जो दौर विकसित हुआ उससे यूक्रेन युद्ध में विस्थापित हुए 80 हजार बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा को माध्यम बनाया गया। यूनीसेफ़-समर्थित स्वयंसेवकों ने इन जगहों पर ऐसे स्थान बनाए जहाँ शिक्षक, मनोवैज्ञानिक और खेल प्रशिक्षक, नियमित रूप से बच्चों के साथ खेलते, बात करते हैं एवं उन्हें सकारात्मक रखने का प्रयास करते रहते हैं।
यूएन बाल एजेंसी ने एक वक्तव्य में कहा है कि इस संघर्ष ने, बच्चों की एक पूरी पीढ़ी पर गम्भीर मनोवैज्ञानिक असर डाला है। एजेंसी ने सभी पक्षों से, बच्चों और उनकी देखभाल करने वालों को, किसी भी तरह के हमलों से सुरक्षित रखे जाने का आहवान भी किया और ‘सुरक्षित स्कूल घोषणा-पत्र’ का सम्मान करने का आग्रह भी किया है।
युद्ध का परिणाम इतना वीभस्त हो सकता है यह मेरी कल्पना के परे है। अभी भी युद्ध थमने के कोई खास आसार नजर नहीं आते। फिर क्या ऐसे में ये सवाल नहीं उठता क्या संप्रभुता संपन्न देशों का दायित्व नहीं है कि युद्ध के बाद होने वाले परिणामों की चिंता करें। जान माल की क्षति की भरपाई तो फिर भी की जा सकती है परंतु बाल मन पर इन ह्रदयविदारक परिस्थितियों ने कभी न मिटने वाली जो छाप छोड़ दी है उस क्षति को कैसे पूरा कर पाएंगे। फिर उम्मीदों के गहन अधिकार के बीच क्या यह कहना सही नहीं होगा कि हर तरफ राख है…….

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