पिंडारी परिदृश्य का प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व
मूल लेखक: डॉ. जी. एस. रावत, NASI वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अनूप साह, पद्मश्री उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में स्थित पिंडारी परिदृश्य प्रदेश के सर्वाधिक मनोरम प्राकृतिक क्षेत्रों में से एक है। यह भारत सहित विदेशों के विद्वानों, प्रकृतिविदों, पदयात्रियों और साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य है।
यह परिदृश्य अपनी तीन विशिष्ट घाटियों—सुंदरढूंगा, पिंडारी (जिसमें कफनी घाटी भी सम्मिलित है) तथा सरयू घाटी—के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहाँ अनेक ऊँची पर्वत चोटियाँ स्थित हैं, जिनमें मैकटोली, बलजूरी, पनवाली द्वार, नंदा खाट, नंदा कोट, छांगुज, लास्पा धुरा और डांगथल प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, यहाँ ट्रेल्स पास (Traill’s Pass) तथा दानू धुरा दर्रा जैसे कुछ उच्च पर्वतीय दर्रे भी हैं।
इस परिदृश्य के निचले भाग को सामान्यतः मल्ला दानपुर के नाम से जाना जाता है। यहाँ कृषि और पशुपालन पर आधारित समुदाय निवास करते हैं, जिनकी सांस्कृतिक परंपराएँ समृद्ध हैं और जिन्हें प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से संबंधित पारंपरिक ज्ञान विरासत में प्राप्त हुआ है।
यह संपूर्ण परिदृश्य नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Nanda Devi Biosphere Reserve—NDBR) का अभिन्न अंग है तथा बागेश्वर वन प्रभाग की ग्लेशियर रेंज के अंतर्गत आता है।
विश्वभर में जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन इस प्रकार किया जाता है कि स्थानीय समुदायों और जैव-संसाधनों के बीच सामंजस्य बना रहे। इसके लिए वन संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित किया जाता है तथा स्थानीय लोगों के लिए सतत पारिस्थितिकी पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन और कृषि उत्पादों की बिक्री जैसे माध्यमों से आजीविका के नवीन अवसर विकसित किए जाते हैं।
ऐसे में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़े होते हैं—
- क्या हम पिंडारी परिदृश्य की प्रकृति और संस्कृति को संरक्षित रखने के प्रति वास्तव में गंभीर हैं?
- इस क्षेत्र के वनों और वन्यजीवों की वर्तमान स्थिति क्या है?
- इस क्षेत्र में ऐसी कौन-सी संभावनाएँ हैं, जिनका अभी तक समुचित उपयोग नहीं किया जा सका है?
इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के उद्देश्य से हम दोनों लेखक, युवा छायाकार श्री आदित्य चौधरी तथा कुछ स्थानीय टूर गाइडों के साथ अक्टूबर 2026 में पिंडारी हिमनद और सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी भागों के समीपवर्ती क्षेत्रों की यात्रा पर गए।
यह उल्लेखनीय है कि हममें से एक लेखक, श्री अनूप साह वर्ष 1964 से इस क्षेत्र का भ्रमण करते रहे हैं। उन्हें अक्टूबर 1972 में नंदा खाट पर प्रथम आरोहण करने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने वर्ष 1972 में बलजूरी, वर्ष 1990 में मैकटोली तथा वर्ष 1994 में ट्रेल्स पास का आरोहण किया। बलजूरी पर उन्होंने वर्ष 1972 में पहली बार और पुनः वर्ष 2024 में आरोहण किया।
दूसरे लेखक, डॉ. जी. एस. रावत वर्ष 1980 से नंदा देवी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का अध्ययन करते आ रहे हैं।
हम उत्तराखंड वन विभाग (UKFD), कुमाऊँ मंडल विकास निगम (KMVN) तथा लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने प्रबंधन संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ उपलब्ध कराने और यात्रा के लिए आवश्यक व्यवस्थागत सहयोग प्रदान करने में सहायता की।
उपरोक्त परिदृश्य की यात्रा के दौरान किए गए हमारे अवलोकनों और उनसे प्राप्त सुझावों का सार आगे प्रस्तुत है।
खाती गाँव में कृषि की घटती उत्पादकता और वन्यजीवों से बढ़ती चुनौतियाँ
पिंडारी हिमनद के प्रवेशद्वार के रूप में प्रसिद्ध खाती गाँव के आसपास भ्रमण करते हुए हमें पता चला कि गाँव में कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई है।
इसके प्रमुख कारण हैं—युवाओं की कृषि के प्रति घटती रुचि, बदलती जलवायु तथा जंगली जानवरों द्वारा फसलों को पहुँचाया जाने वाला नुकसान। फसलों को क्षति पहुँचाने वाले प्रमुख वन्यजीवों में लंगूर, रीसस मकाक (बंदर), जंगली सूअर, साही तथा कभी-कभार काला भालू भी शामिल हैं।
एक ग्रामीण ने हमें बताया कि पिछली शाम एक तेंदुए ने उसकी दो बकरियों को मार डाला था, जिससे उसे काफी आर्थिक नुकसान हुआ।
उसे इस बात का भरोसा नहीं था कि उसे इस नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजा मिल पाएगा। उसका कहना था कि नुकसान की सूचना देने के लिए भराड़ी स्थित रेंज कार्यालय तक जाना और फिर शिकार की पुष्टि कराने की प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना उसके लिए व्यावहारिक रूप से लाभकारी नहीं था।
ग्रामीणों ने यह स्वीकार किया कि गाँवों के आसपास इन वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन साथ ही उनका यह भी कहना था कि आसपास के जंगलों में वन्यजीवों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है।
यह स्थिति विशेष ध्यान देने योग्य है। गाँवों के आसपास वन्यजीवों की बढ़ती उपस्थिति और उनके प्राकृतिक आवासों में उनकी संख्या का कम होना, दोनों मिलकर मानव-वन्यजीव संघर्ष की जटिलता को सामने लाते हैं। इस समस्या को केवल जानवरों की संख्या के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं होगा; इसके लिए उनके प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता, वन पारिस्थितिकी और ग्रामीण आजीविका के बीच संबंधों को भी समझना आवश्यक है।
मधुमक्खी पालन, शहद और स्थानीय आजीविका की संभावनाएँ
गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि मल्ला दानपुर क्षेत्र कभी दो विशेष उत्पादों—शहद और घी—के लिए जाना जाता था।
वर्तमान में गाँव में केवल कुछ परिवार ही मधुमक्खी पालन करते हैं।
यात्रा के दौरान हमें एक महिला मधुमक्खी पालक को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। उसके पास मधुमक्खियों के छह बक्से थे और वह मधुमक्खी पालन तथा शहद निकालने की प्रक्रिया में अच्छी तरह दक्ष थी।
हालाँकि, अधिकांश मधुमक्खी पालक आधुनिक बक्सों के बजाय पारंपरिक लकड़ी के लट्ठों से बने छत्तों को प्राथमिकता देते थे। उनके अनुसार, मधुमक्खियाँ आधुनिक बक्सों में टिककर नहीं रहतीं।
इसके अतिरिक्त, शहद निकालने की प्रचलित विधि अपरिष्कृत थी, जिसमें काफी शहद व्यर्थ चला जाता था।
हमारा अनुभव रहा कि ग्रामीणों को निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है—
- आधुनिक एवं वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन;
- शहद निकालने की बेहतर और कम अपव्ययी तकनीकें;
- स्थानीय सब्जियों का उत्पादन;
- मशरूम की खेती तथा उत्पादन;
- स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित अन्य आजीविका गतिविधियाँ।
यदि इन गतिविधियों को उपयुक्त प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और बाजार से जोड़ा जाए, तो ये ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं। इससे कृषि एवं पारंपरिक आजीविका के प्रति युवाओं की रुचि पुनर्जीवित करने की संभावनाएँ भी बन सकती हैं।
. स्थानीय पारंपरिक ज्ञान और वन्यजीवों में गिरावट
यात्रा के अंतिम चरण में हमारी मुलाकात झूनी गाँव के 85 वर्षीय श्री भागीचंद्र सिंह टाकुली से हुई।
उन्हें स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं, विशेषकर उच्च औषधीय महत्त्व वाले पौधों के संबंध में व्यापक अनुभव और ज्ञान प्राप्त है।
उनके अनुसार, लगभग 40–50 वर्ष पहले सरयू जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी हिस्से तथा पंखू क्षेत्र में वन्यजीवों की पर्याप्त समृद्धि थी। उस समय इस क्षेत्र में कस्तूरी मृग, सांभर, काकड़ अर्थात भौंकने वाला हिरण तथा एशियाई काला भालू जैसे वन्यजीव बड़ी संख्या में पाए जाते थे।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1972 में उन्होंने कस्तूरी मृग के दो शावकों को पकड़ा था, जिन्हें धरमघर स्थित कस्तूरी मृग प्रजनन केंद्र के लिए ले जाया गया था।
उनके अनुभव के अनुसार, ऊँचाई वाले क्षेत्रों के वन अब काफी हद तक क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। औषधीय पौधों की कई प्रजातियों में तेजी से गिरावट आई है और हाल के दशकों में इस क्षेत्र से कस्तूरी मृग स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो चुका है।
यहाँ स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने का आशय है कि संबंधित प्रजाति इस क्षेत्र में अब नहीं पाई जा रही है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वह पूरी दुनिया से विलुप्त हो गई है।
श्री टाकुली के अनुसार, मल्ला दानपुर के लोगों के लिए आय के प्रमुख साधन अब सीमित रह गए हैं। इनमें भांग की खेती, उच्च हिमालयी बुग्यालों से कैटरपिलर फंगस अर्थात कीड़ा जड़ी का संग्रह तथा पर्यटकों और पदयात्रियों की सहायता करना शामिल है।
उन्होंने यह भी बताया कि कीड़ा जड़ी की उपलब्धता में तेजी से कमी आ रही है।
वनों का क्षरण, औषधीय वनस्पतियों की घटती उपलब्धता और वन्यजीवों में गिरावट केवल पर्यावरणीय समस्याएँ नहीं हैं। ये स्थानीय समुदायों की पारंपरिक आजीविका, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी गंभीर चुनौती हैं।
5.पारिस्थितिकी पर्यटन, प्रकृति शिक्षा और साहसिक पर्यटन की व्यापक संभावनाएँ
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिंडारी परिदृश्य में सुव्यवस्थित पारिस्थितिकी पर्यटन, प्रकृति शिक्षा, पक्षी अवलोकन तथा साहसिक पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं।
वर्तमान में अधिकांश पर्यटक और पदयात्री पिंडारी हिमनद के जीरो पॉइंट तक ही जाते हैं। जबकि इस क्षेत्र में कई ऐसे गंतव्य मौजूद हैं, जो प्राकृतिक सौंदर्य की दृष्टि से उतने ही आकर्षक या संभवतः उससे भी अधिक सुंदर हैं।
इन स्थलों की पहचान करने, उन्हें संरक्षित रखने और स्थानीय पारिस्थितिकी पर्यटन समितियों के माध्यम से विकसित करने की आवश्यकता है। ऐसी समितियों का संचालन न्यायसंगत और सतत सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, ताकि पर्यटन से होने वाले लाभों का उचित वितरण हो सके और प्रकृति पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
पर्यटन विभाग ने खाती से जीरो पॉइंट के बीच कुछ आधारभूत सुविधाएँ विकसित की हैं। इनमें वर्षा से बचाव के लिए शेड, इग्लू आकार की झोपड़ियाँ, दृश्यावलोकन स्थल तथा स्थायी शौचालय शामिल हैं।
लेकिन उचित रखरखाव के अभाव में अधिकांश वर्षा-आश्रय और शौचालय जर्जर अवस्था में पहुँच गए हैं और अब उपयोग के योग्य नहीं रह गए हैं।
अल्पाइन घास के मैदानों में बनाए गए कुछ दृश्यावलोकन स्थल और वर्षा-आश्रय अधूरे हैं तथा उनका स्थान-चयन भी उचित ढंग से नहीं किया गया है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि अत्यंत संवेदनशील अल्पाइन घास के मैदानों को गंभीर क्षति पहुँची है। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ा है, वनस्पतियों का नुकसान हुआ है और प्राकृतिक परिदृश्य की सुंदरता भी प्रभावित हुई है।
यह एक गंभीर विडंबना है कि प्रकृति का सौंदर्य दिखाने के उद्देश्य से विकसित की गई कुछ पर्यटन सुविधाएँ स्वयं उसी प्रकृति को नुकसान पहुँचा रही हैं, जिसके संरक्षण के लिए उनकी आवश्यकता थी।
मार्ग के किनारे लगे अधिकांश सूचना-पट्टों पर पुरानी, अनावश्यक अथवा भ्रामक जानकारियाँ अंकित हैं, जो पर्यटकों के लिए बहुत उपयोगी नहीं हैं।
इसके स्थान पर पर्यटकों को आवश्यक जानकारी व्यवस्थित ढंग से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसमें पूरे परिदृश्य का रूपरेखा मानचित्र तथा क्या करें और क्या न करें—इससे संबंधित स्पष्ट निर्देश शामिल होने चाहिए।
ऐसी जानकारी खाती के निकट प्रवेश बिंदु पर तथा खाती, द्वाली और फुरकिया स्थित विश्रामगृहों में प्रदर्शित की जानी चाहिए, न कि केवल पदयात्रा मार्ग के किनारे।
संक्षेप में, विश्रामगृहों, उनके आसपास के परिसर तथा संपूर्ण पर्यटक अनुभव के प्रबंधन में अधिक व्यावसायिक दक्षता और उत्तरदायित्व की आवश्यकता है।
इससे भी महत्त्वपूर्ण है कि मुख्य पदयात्रा मार्ग की पर्यावरणीय वहन क्षमता (Carrying Capacity) का वैज्ञानिक आकलन किया जाए। इसके साथ ही प्रकृति प्रेमियों को अन्य उपयुक्त मार्गों की ओर प्रोत्साहित करके मुख्य मार्ग पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जाना चाहिए।
पर्यटन का उद्देश्य केवल अधिकाधिक पर्यटकों को किसी स्थल तक पहुँचाना नहीं होना चाहिए। उसका वास्तविक उद्देश्य यह होना चाहिए कि लोग प्रकृति का अनुभव करें, स्थानीय समुदायों को लाभ मिले और प्राकृतिक संसाधनों को दीर्घकालिक क्षति न पहुँचे।
- स्थानीय संस्कृति का संरक्षण और सामुदायिक पहल
इस परिदृश्य की संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए गंभीर, समन्वित और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के प्रबंधन में स्थानीय संस्कृति का संरक्षण एक अनिवार्य घटक है।
क्षेत्र के अनेक गाँवों में निराश और बेरोजगार युवा शराब की लत तथा नकद आय अर्जित करने के अन्य अनुचित या तात्कालिक उपायों की ओर बढ़ गए हैं।
हालाँकि, जटोली गाँव और वाछम क्षेत्र के महिला स्वयं सहायता समूह ने आशा की एक उल्लेखनीय किरण दिखाई है।
इस समूह ने शराब के सेवन और बिक्री पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया है। साथ ही, गाँव के रास्तों और घरों के आसपास प्लास्टिक के रैपर तथा बोतलें फेंकने की समस्या को भारी जुर्माना लगाने के माध्यम से प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया है।
यह उदाहरण बताता है कि जब स्थानीय समुदाय स्वयं अपनी सांस्कृतिक गरिमा, सामाजिक अनुशासन और पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेते हैं, तो सकारात्मक बदलाव संभव हो जाता है।
इस प्रकार की पहलों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए और पूरे पिंडारी परिदृश्य में अन्य गाँवों तक भी पहुँचाया जाना चाहिए।
भारत सरकार के राष्ट्रीय हरित मिशन के अंतर्गत स्थानीय युवाओं के लिए निम्नलिखित कार्यक्रम विशेष रूप से उपयोगी हो सकते हैं—
- प्रकृति शिक्षा शिविर;
- पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता कार्यक्रम;
- प्रकृति में आचरण और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व से संबंधित प्रशिक्षण;
- हरित कौशल विकास कार्यक्रम;
- स्थानीय संसाधनों पर आधारित पर्यावरण-अनुकूल रोजगार के अवसर।
इन पहलों से युवाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी, उनकी रोजगार क्षमता विकसित होगी और वे अपने क्षेत्र के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे।
हम यह भी सुझाव देते हैं कि स्थानीय युवाओं और विद्यार्थियों को प्रवेश चौकी पर लिए जाने वाले प्रवेश शुल्क से छूट दी जानी चाहिए।
इससे उन्हें अपने ही क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को समझने, उसका अध्ययन करने और उसके संरक्षण में भागीदारी निभाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
- निष्कर्ष: विकास और संरक्षण के बीच संतुलन की अनिवार्यता
जब तक पिंडारी परिदृश्य के लिए एक सशक्त, सहभागी, दूरदर्शी और समन्वित संरक्षण एवं विकास योजना व्यवहार में नहीं लाई जाती, तब तक इस अद्भुत प्राकृतिक क्षेत्र का भविष्य संकट में बना रहेगा।
प्रकृति संरक्षण, स्थानीय संस्कृति, ग्रामीण आजीविका, पर्यटन प्रबंधन और जैव विविधता को अलग-अलग विषय मानकर नहीं देखा जा सकता। ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
वनों की रक्षा किए बिना वन्यजीवों को बचाना कठिन है। स्थानीय लोगों की आजीविका सुरक्षित किए बिना उनसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की अपेक्षा करना भी उचित नहीं है। इसी प्रकार, पर्यटन को सुव्यवस्थित किए बिना उसकी आर्थिक संभावनाओं का दीर्घकालिक लाभ प्राप्त करना संभव नहीं होगा।
इसलिए आवश्यक है कि संरक्षण और विकास की सभी योजनाएँ स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी, वैज्ञानिक अध्ययन, पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरणीय सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाई जाएँ।
लेखक अंत में एक अत्यंत सारगर्भित चेतावनी देते हैं। यदि हमने समय रहते पिंडारी परिदृश्य की प्रकृति और संस्कृति को बचाने के लिए समुचित कदम नहीं उठाए, तो इस अद्भुत क्षेत्र का भविष्य उस मुर्गी जैसा हो सकता है, जो सोने के अंडे देती थी, लेकिन अपने ही लालची मालिक का शिकार बन गई।
यह रूपक हमें याद दिलाता है कि प्रकृति हमें अपार संपदा प्रदान करती है, लेकिन उसका असीमित दोहन अंततः उसी संपदा को नष्ट कर सकता है।
पिंडारी परिदृश्य की वास्तविक समृद्धि केवल उसके हिमनदों, पर्वत चोटियों, वनों और बुग्यालों में नहीं, बल्कि उन लोगों के ज्ञान, संस्कृति और जीवन-पद्धति में भी निहित है, जिन्होंने पीढ़ियों से इस भूमि के साथ अपना संबंध बनाए रखा है।
इस प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का अर्थ केवल एक सुंदर पर्यटन स्थल को सुरक्षित रखना नहीं है; इसका अर्थ है हिमालय की जीवंत विरासत और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करना।












