कुमाऊँ विश्वविद्यालय में अब नौकरी करना नहीं होगा आसान, साथ ही शोध डी.लिट. व डीएससी. के मानदंड भी कड़े

नैनीताल। कुमाऊँ विश्वविद्यालय की 157वीं कार्यपरिषद् की बैठक में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध मानकों और संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। बैठक में विशेष रूप से शिक्षकों के प्रदर्शन मूल्यांकन, शोध प्रकाशनों की गुणवत्ता और सेवा निरंतरता को लेकर एक व्यापक ढांचा तैयार किया गया, जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से एक दूरगामी सुधारात्मक कदम माना जा रहा है।
यह पहली बार है कि देश के किसी विश्वविद्यालय में कार्यपरिषद् ने शिक्षकों के मूल्यांकन के लिए 100 अंकों की एक समग्र स्क्रीनिंग प्रणाली वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन प्रतिवेदन को स्वीकृति प्रदान की है। इस प्रणाली में शिक्षण एवं अधिगम गतिविधियों, शोध प्रकाशनों, शोध परियोजनाओं, पीएचडी पर्यवेक्षण, प्रशासनिक दायित्वों तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी को शामिल किया गया है।
शिक्षण कार्यों के अंतर्गत पाठ्य सामग्री निर्माण, छात्र फीडबैक और परीक्षा संबंधी दायित्वों को वेटेज दिया गया है, जबकि शोध प्रकाशनों के लिए स्कोपस एवं वेब ऑफ साइंस जैसे मान्यता प्राप्त डेटाबेस में प्रकाशित शोध पत्रों को प्राथमिकता दी गई है। साथ ही, पुस्तक प्रकाशन को भी निर्धारित मानकों के अनुसार मूल्यांकन में शामिल किया गया है।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि 50 वर्ष की आयु के बाद लगातार खराब प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को शासनादेश दिनांक 6 जुलाई 2017 (एफ.आर. 56(जे)) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा सकेगी, जिसके लिए कार्यपरिषद् की स्वीकृति आवश्यक होगी। यह प्रावधान विश्वविद्यालय में उत्तरदायित्व और कार्यकुशलता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सेवा निरंतरता के संदर्भ में भी स्पष्ट मानदंड तय किए गए हैं। 75 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने वाले शिक्षकों को प्रशंसा पत्र प्रदान किया जाएगा, जबकि 60 से 75 प्रतिशत के बीच अंक पाने वालों को सुधार के लिए दो वर्ष का समय दिया जाएगा। 60 प्रतिशत से कम अंक प्राप्त करने वाले शिक्षकों को तीन वर्ष का अवसर दिया जाएगा, इस दौरान उनकी वेतन वृद्धि रोकी जा सकती है। निर्धारित अवधि में सुधार न होने पर संबंधित प्रावधानों के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति लागू की जाएगी। संविदा शिक्षकों के लिए भी यह प्रावधान किया गया है कि 60 प्रतिशत से कम स्कोर होने पर उनके अनुबंध का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा।
शोध परियोजनाओं, पीएचडी पर्यवेक्षण तथा प्रशासनिक दायित्वों को भी मूल्यांकन प्रणाली में समुचित वेटेज दिया गया है, जिससे शिक्षकों की समग्र अकादमिक भूमिका का आकलन किया जा सके। इसके साथ ही, प्रत्येक शिक्षक के लिए राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में कम से कम एक प्रस्तुति देना अनिवार्य किया गया है, जिसमें एक प्रस्तुति राज्य के बाहर होना आवश्यक होगा।
शोध गुणवत्ता को लेकर विश्वविद्यालय ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों में प्रकाशन के लिए वेब ऑफ साइंस (एस.सी.आई./एस.सी.आई.ई./ए.एच.सी.आई./एस.एस.सी.आई.) या स्कोपस में इंडेक्स्ड जर्नलों को अनिवार्य किया गया है, जबकि कला, मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों में स्कोपस, वेब ऑफ साइंस या विश्वविद्यालय द्वारा अनुमोदित जर्नलों में प्रकाशन को मान्यता दी गई है। साथ ही, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा प्रकाशित जर्नलों को भी स्वीकार्य माना गया है। विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित जर्नलों के लिए सीमित संख्या में प्रकाशनों को ही मान्यता दी जाएगी।
कार्यपरिषद् ने फर्जी एवं निम्न गुणवत्ता वाली पत्रिकाओं पर रोक लगाने के लिए स्पष्ट अस्वीकृति मानदंड भी निर्धारित किए हैं। जिन जर्नलों में फर्जी या अमान्य आई.एस.एस.एन., अस्पष्ट प्रकाशक विवरण, स्पष्ट पीयर-रिव्यू नीति का अभाव, पारदर्शी सबमिशन प्रणाली की कमी, संदिग्ध या प्रीडेटरी मेट्रिक्स (जैसे एस.जे.आई.एफ., जी.आई.एफ. आदि) का उपयोग, या जो बील्स लिस्ट, यू.जी.सी. केयर एक्सक्लूडेड लिस्ट जैसी ब्लैकलिस्ट में शामिल हैं, उन्हें स्वतः अस्वीकृत माना जाएगा। इसके अतिरिक्त, भ्रामक नाम वाले या उन डेटाबेस में सूचीबद्ध न होने वाले जर्नल, जिनका वे दावा करते हैं, भी मान्य नहीं होंगे।
इसके अतिरिक्त, डी.एससी./डी.लिट. जैसी उच्च शोध उपाधियों के लिए कड़े मानदंड निर्धारित किए गए हैं। अभ्यर्थी के पास पीएचडी के साथ न्यूनतम 12 वर्ष का अनुभव होना आवश्यक होगा तथा उसे अपने शोध प्रकाशनों के माध्यम से विशिष्ट विद्वत्ता प्रदर्शित करनी होगी।
विज्ञान विषयों में कम से कम 25 शोध पत्र स्कोपस/एस.सी.आई./एस.सी.आई.ई. जर्नलों में, औसत इम्पैक्ट फैक्टर 2.0 (जे.सी.आर.) तथा एच-इंडेक्स 20 अनिवार्य किया गया है। वहीं मानविकी एवं वाणिज्य विषयों में 12 शोध पत्र (कम से कम एक स्कोपस) या 8 शोध पत्र एवं एक पुस्तक का प्रकाशन आवश्यक होगा, जो विश्वविद्यालय के निर्धारित मानकों के अनुरूप हो।
हिंदी एवं अन्य गैर-स्कोपस विषयों के लिए केयू सूचीबद्ध जर्नलों में प्रकाशन स्वीकार्य होगा, जहाँ न्यूनतम 12 शोध पत्र एवं एक पुस्तक अनिवार्य होगी। सभी प्रकाशनों की गुणवत्ता, मौलिकता एवं पीयर-रिव्यू स्थिति को प्राथमिकता दी जाएगी।
पुस्तक प्रकाशन के लिए दिशा-निर्देश जारी करते हुए शैक्षणिक पुस्तकों के प्रकाशन हेतु स्पष्ट मानक निर्धारित किए गए हैं, जिससे गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।
साथ ही, बैठक में 7 अध्यापकों को कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के अंतर्गत पदोन्नति प्रदान किए जाने को भी स्वीकृति दी गई।
कुलपति प्रो. दीवान एस. रावत ने कहा कि समग्र रूप से कार्यपरिषद् के ये निर्णय विश्वविद्यालय में शैक्षणिक उत्कृष्टता, शोध की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हैं। उन्होंने कहा कि इन सुधारों से न केवल शिक्षकों की कार्यक्षमता में वृद्धि होगी, बल्कि संस्थान की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा भी सुदृढ़ होगी।

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